व्यक्ति, समाज और राजनीति में सामान्यतः हर दौर में भले और बुरे तत्त्व मौजूद रहे हैं। लेकिन समाज की एक लगभग मान्य नैतिक संहिता भी हमेशा रही है, हालांकि वह ज़्यादातर हारती ही रही है। पर उस हार के समय भी एक नैतिक बोध ज़रूर बना रहता है।
वे दौर विकट होते हैं जब यह मान्य संहिता दम ही तोड़ दे और सारा अपशिष्ट (गंदगी) वैध बनकर सतह पर तैरने लगे।
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