इस लेख में प्रयुक्त मीडिया से आशय 'मीडिया की मुख्यधारा के अधिकांश' से है.
सामान्यीकरण बुरे होते हैं क्योंकि वे वास्तविकता के आंशिक पक्ष का ही प्रतिनिधित्त्व करते हुए होते हैं. मुख्य पक्ष को छोड़कर कमजोर और सतही बात ही करते हैं.
मीडिया के उत्पादों (यानी ख़बरों) की डिज़ाइन कुछ यूँ की जाती है कि वह अपने दर्शक/श्रोता/पाठक की उपभोक्ता रूचि को संतुष्ट कर सके.मीडिया, मत बनाने के अपने दायित्व में सामान्यीकरणों से काम लेता है, आंशिक पक्षों को उभारकर अपने उपभोक्ता को संतुष्ट करने की जल्दी में होता है. उपभोक्ता भी जल्दी में होता है.ऐसे में, खबर अपने सबसे खराब रूपमें, जिंसके रूप में परोसी जाती है.वह जरूरी प्रसंगों को छोड़कर अपने उपभोक्ता की सहज जिज्ञासु भावना का शमन करने या फिर उसको उत्तेजित करने के काम में लग जाती है.ऐसे सामान्यीकरण मीडियाकर्मियों के लिए उपयोगी और आसान औजार होते हैं क्योंकि वे उसके उपभोक्ता को बांधे रखते हैं.
रोचक लेकिन कम स्वस्थ बात ये है कि उपभोक्ता को भी उबाऊ और नीरस माने जाने वाले विवरणों, तथ्यों,आंकड़ों और विश्लेषणों से बच जाना अच्छा लगता है. मानसिक श्रम के बिना किसी चीज को ग्रहण करना उपभोक्ता को आसान लगता है.सरल शब्दों में दर्शक या पाठक भी सतही ख़बरों के लिए अधिक तत्पर रहते हैं.
मीडिया-उत्पाद इस उपभोक्ता के लिए मत-निर्माण और सचेत नागरिक बनाने के श्रमसाध्य काम को छोड़कर निम्न में से कुछ चुनता है:
--सत्ताधारियों या राजनीतिज्ञों को अवमानपूर्ण नज़रिये से देखने के अवसर ढूंढना,
--सेलेब्रिटीज़ के फैशन, नखरे, उनके जीवन में ताक-झाँक के अवसर,
--अपराध की ख़बरों का सनसनीखेज प्रस्तुतीकरण और,
--खेल-कूद की गैर-आनुपातिक कवरेज़
मीडिया न सिर्फ तड़क-भड़क वाले मसलों का चुनता है बल्कि अपने आपको इन्हीं या इनसे मिलते-जुलते विषयों में सीमित और केंद्रित रखता है. मीडिया शब्दोंसे, शब्दोंके अभिप्रायों से खिलवाड़ करता है और उसको अपनी रचनात्मकता समझने का भ्रम रचता है. दुःखद है कि ग्राहक उसी में नया पन तलाशता है. अर्थ-अभिप्राय, विवेक... सब गौड़ हो जातेहैं. रूचियों के विकृतिकरण का यह खेल चक्रीय क्रम से चलता रहता है.
महत्त्वपूर्ण तथा वृहत्तर सन्दर्भों को समझना कभी भी आसान नहीं होता. इसके लिए न सिर्फ धैर्य की ज़रूरत होती है बल्कि कुछ निश्चित क्षमताओं की भी ज़रूरत पड़ती है.इसको अर्जित करने के लिए बौद्धिक श्रम की ज़रूरत होती है जो न तो सबके लिए रुचिपूर्ण होता है और न ही सबके पास इतना मानसिक अवकाश आज के सामाजिक-सांस्कृतिक सन्दर्भों में उपलब्ध है. इसलिए कम महत्त्वपूर्ण बातों को अधिक ज़रूरी बना कर न सिर्फ पेश किया जाता है बल्कि ख़ुशी-ख़ुशी ग्रहण भी किया जाता है.
उपभोक्ता-मानस की एक समस्या होती है फैशन की चीज़ों के लिए लगातार बनती मनोवृत्ति बौद्धिक-उत्पादों को भी उसी तराजू में तोलने लगती है.इस तरह की प्रवणता होना स्वाभाविक (हम सब जानते हैं कि सारी स्वाभाविक चीजें स्वस्थ नहीं होतीं) है. यह उत्पादों की गुणवत्ता (इस मामले में, समाचार) को भी प्रभावित करती है. पैकेजिंग पर ज़ोर बढ़ जाता है, विषय वस्तु पर कमजोर ही बनी रहती है.
मीडिया कई बार अतिशयोक्तियों और कई बार न्यूनोक्तियों पर अनावश्यक आग्रह रखती हुयी दिखाई देता है. जैसे राजनीति पर उसकी टिप्पणियों को देखें तो साफ़ पता चलता है. 'अमुक मुद्दे पर वे राजनीति कर रहे हैं', 'राजनीति नहीं होनी चाहिए' आदि-इत्यादि। राजनीति तो है ही सार्वजनिक मसलों में रूचि लेना, बात करना, भाषण देना, धरना, प्रदर्शन और रैली करना। राजनीतिक व्यक्तियों को इसे करना ही चाहिए, यही इसका मंतव्य भी है. मीडिया का काम है इन प्रदर्शनों, कार्रवाइयों के बीच मुद्दे को सारपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करे, राजनेताओं से गंभीर प्रश्न पूछे और इस प्रक्रिया में अपने दर्शक/श्रोता/पाठक की अपेक्षाएं न सिर्फ दुरुस्त करे बल्कि उनका परिशोधन करे.