साहित्य का आत्म-सत्य
निर्मल वर्मा की इस शीर्षक की पुस्तक बहुत अच्छी लगी. उनके भाषणों, साक्षात्कारों और निबंधों का संग्रह है. उनका गद्य श्रेष्ठ है. भाषा, साहित्य, जातीय चेतना, विचार और विचारधारा पर सम्यक रौशनी डाली है. बहुत पठनीय है.
उनका मानना है कि लेखन में विचार की ज़रूरत है लेकिन विचारधारा की नहीं. उनके अनुसार ' जहाँ विचार और साहित्य एक दूसरे का पोषण करते हैं, वहीं विचारधारा उसे विष की तरह खोखला करती है.'
बात सही हो सकती है.
मेरी एक जिज्ञासा है. अगर विचार सही है तो विचारधारा क्यों नहीं? विचार छुट-पुट ढंग से सही हो सकते हैं, उनमे कोई आतंरिक संगति न हो तो वे सही हैं और अगर वे वृहद् परिप्रेक्ष्य को समझने में.... एक तार्किक संगति बनाये रखकर आगे बढ़ते हैं तो वे विष-तुल्य कैसे हो जाते हैं?
विचार सही है तो विचार-श्रृंखला कैसे गलत है?
मेरी समझ में विचार विचारधारा का सब-सेट है.
विचारधारा विरोध कहीं विचार का ही प्रच्छन्न-विरोध तो नहीं है?
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