Sunday, 8 July 2018

मुहावरा-निर्मित समझ?


मुझे लगता है कि हमारी चेतना का, या यूं कहिये कि सामान्य समझ का बड़ा हिस्सा उक्ति/ सूक्ति-कथनों, मुहावरों, चुटकुलों से निर्मित है।


मुहावरे, कथन आदि संचित ज्ञान के हिस्से होते हैं और कई बार वे समय की परीक्षा में खरे भी उतरते हैं। लेकिन उनका यथार्थ से संबंध कभी-कभी बड़ा उथला और सामान्यीकृत किस्म का होता है जो नयी परिस्थितियों में लागू होते समय कई बार उथली समझ और उथले निर्णयों का कारण भी बनता है.


 लेकिन, चूंकि ये कथन-मुहावरे-उक्तियाँ सामान्य बोध का हिस्सा होती हैं और इस नाते यथार्थ के साथ उथला/ उल्टा सम्बन्ध भी बड़ा स्वाभाविक सा और वैध लगता है।


मुझे लगता है कि यह नयी परिस्थितियों की समझ और उनके सही विश्लेषण को बाधित करता है। इसलिये इनका समय-समय पर परीक्षण करते रहना चाहिए, इनकी सीमायें उद्घाटित करते रहना  विशिष्ट महत्त्व का मानना चाहिए।

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