Friday, 21 December 2012

विचारणीय यह नहीं कि लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में किसी की स्वीकृति कितनी है...विचारणीय तो यह बात है कि उस स्वीकृति के संदर्भ क्या हैं...उसका प्राण-रस कहाँ से आ रहा है...वह जनाकांक्षा का कितनी प्रामाणिकता से प्रतिनिधित्व कर रहा है? जनाकांक्षा क्या अपनी वास्तविक मंशा को अभिव्यक्त करने के मौके पा रही है? कहीं जनता भी तो नहीं खंडित विकास की अवधारणा को सच मानकर बैठ गयी है? क्या जनता वृहद मानवीय सन्दर्भों को समझने और उसके अनुरूप लोकतांत्रिक आचरण कर पाने में सफल हो पा रही है या कुशल योजनाकारों की रणनीतियों के कुहासे में भटक गयी है? राजनीतिक प्रक्रिया क्या मतदाता को शिक्षित कर पा रही है? मत बनाने का कार्य मीडिया करता है तो वह कितनी प्रामाणिकता से छवियों का निर्माण कर रहा है? मीडिया अपने दैनिक दायित्वों(!) की ओट में कहीं लोकतांत्रिक प्रक्रिया के दीर्घकालिक लक्ष्यों से भटक तो नहीं गया? उसके कोई दीर्घकालिक, सकारात्मक लक्ष्य हैं भी या नहीं? हैं तो वे कितने जनपक्षधर हैं? मैं इस बात में यकीन नहीं कर सकता कि 'जीत सच्चाई और नेकी की होती है'...जीत के आधार परसेप्शन में होते हैं और परसेप्शन सच के आधार पर भी बनते हैं और झूठ के कुशलतापूर्वक इस्तेमाल पर भी...इसके ढेरों उदाहरण इतिहास से लेकर वर्तमान तक हैं.

अब ये अलग बात है कि एक बात को मापने के ठोस सांख्यिकीय पैमाने हैं और दूसरी बात के केवल आनुभविक. सांख्यिकीय पैमानों से कथन प्रामाणिक बनते हैं, आनुभविक बातों से नहीं...पर यदि अनुभवों में प्रामाणिकता है तो दीर्घकाल में उनका सांख्यिकीय मापन भी होता है...और हकीकत आज आप पहले के सांख्यिकीय दावों की उपलब्धि की सच्चाई के आधार पर कर सकते हैं.

Tuesday, 24 July 2012

टैक्स जस्टिस नेटवर्क की ताज़ा अध्यनन रिपोर्ट कहती है कि ऑफशोर टैक्स ३२ ट्रिलियन डॉलर है. यह इतना अधिक है कि विश्व के तमाम विकासशील देश कर्जमुक्त हो जायेंगे. साथ ही कुछ और चौंकाने वाली बातें भी इसमें हैं जैसे आज भी अफ्रीका से जितना धन बाहर जाता है उससे कम कहीं सहायता के लिए पश्चिमी दुनिया से उसके पास आता है. अनुपात ३:१ का है. तो वैश्वीकरण के असंख्य दावे कि वे तीसरी दुनिया का उद्धार कर रहे हैं...झूठ और छल है...और अधिक लूटने का. पश्चिम की समृद्धि में एशिया और अफ्रीका का कच्चा मॉल और श्रम न सिर्फ पहले लगा बल्कि अब भी यह प्रक्रिया रुकी नहीं. पर चूंकि संचार साधनों और यहाँ तक कि सारे प्रभावी सांस्कृतिक उत्पादों पर पश्चिमी दुनिया का वर्चस्व है इसलिए यह और तमाम इस जैसे सत्य मुखर होकर सामने नहीं हो पाते.

Wednesday, 18 July 2012

अन्य हर काम की तरह मैं ब्लॉग पर भी अनियमित ही रह रहा हूँ. कारण पता नहीं क्या है...एक अजीब सी निराशा क्यों रहती है...पूरा तंत्र जैसे खून चूस रहा हो...प्रत्यक्षतः मेरे जीवन में ऐसा कुछ भी नहीं जो शोषण जैसी स्थिति की तरफ इशारा करे...पर जब हमारे देश में और विश्व में इतने संसाधन हों कि किसी की भी प्राथमिक जरूरतें पूरी होने में कोई बाधा न हो सिर्फ लोभ, लालच और तंत्र की विसंगतियाँ लोगों का जीना हराम कर रही हों तब खा पी के आराम से रहना, मस्ती से सोना संभव नहीं दीखता. ब्रेष्ट की एक कविता याद आ रही है...
समालोचन पर एक बहस चल रही है..कविता के भविष्य को लेकर, साहित्य के भविष्य को लेकर. अच्छी है. भाग न लें तो पढ़ें तो सही.

Saturday, 23 June 2012


आज एक नए स्वामी श्री श्री १००८ कुमारस्वामी के बारे में पता चला. ये स्वामी जी बीज-मन्त्र देते हैं और किसी भी समस्या का समाधान कर सकते हैं...यहाँ तक कि गर्भस्थ शिशु को राष्ट्रपति भी बनाने का दावा करते हैं. बीच में एक ईसाई संत पाल दिनाकरन के बारे में पता चला...रोज ही एक नए बाबा का आविर्भाव. क्या है ये? इस सन्दर्भ में मैंने एक लेख दो माह पहले लिखा था जिसमे मैंने यह प्रस्थापना दी थी कि बाबाओं का आगमन एक प्रवृत्ति है न कि छुटपुट बाबाओं का खेल. यह अन्धविश्वास मात्र नहीं है.                                                   


   निर्मल बाबा व्यक्ति या प्रवृत्ति

निर्मल बाबा कौन हैं? निर्मलजीत सिंह नरूला नाम का सख्श जो भट्ठे और कपड़े के व्यवसाय में तो नहीं सफल हुआ पर आस्था के कारोबार का नया सेलेब्रिटी बन गया है...आखिर सबसे सरल व्यवसाय जो ठहरा! पर समझने की बात यह है कि क्या निर्मल बाबा इस धंधे में सिर्फ एक नया नाम भर है? क्या इनमे और अन्य बाबाओं में कोई भिन्नता है? क्या उन पर ईश्वर(!) की वाकई कोई ‘किरपा’ है? नहीं. निर्मल बाबा सिर्फ एक नया नाम भर नहीं है. वह एक विकसित होती प्रवृत्ति का उन्नततर अगला चरण है. वह लगातार फलती फूलती सभ्यता और संस्कृति का एक नया रूपक है.
यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि जिस स्थान में ठोस या तरल पदार्थ नहीं होता या हटा लिया जाता है, वह गैसीय माध्यम द्वारा घेर लिया जाता है. यहाँ पर हमें एक अद्भुत साम्य दिखता है. लोगों की भौतिक आवश्यकताएं पूरी नहीं हो पायीं, उनमें वैज्ञानिक अभिवृत्ति का विकास नहीं हो पाया...तो इस रिक्त स्थान (भौतिक और मनोवैज्ञानिक दोनों), को रुढिवादिता और अलौकिकता की बढती प्रवृत्ति ने ले लिया...बिलकुल प्रकृति विज्ञानों का अनुसरण हुआ! मानव समाज में विकास मानवीय विज्ञानों की भांति होता तो अधिक अच्छा होता ?
आइये समझते हैं कि आस्था के नए विपणन केंद्र आखिर अपने लिए पहले से संतृप्त बाजार में जगह कैसे बनाते हैं? इसके लिए हमें एक दूसरा साम्य याद आता है...उपभोक्ता वस्तुओं में से जब किसी नए ब्रांड का प्रोडक्ट लॉन्च किया जाता है तो उसकी बिक्री के लिए विपणन प्रबंधक विज्ञापन ऐसे ढंग से बनवाते हैं जिससे वह बिलकुल नयी आवश्यकता को पूरी करनेवाली लगे. इसके लिए आप साबुन या कोल्ड ड्रिंक या कोई भी अन्य विज्ञापन देख सकते हैं...हमारे बाबा, बापू और स्वामी भी यही करते हैं...निर्मल बाबा सारे धर्मों, सारी आस्थाओं के लोगों के लिए समागम खुला रखते हैं, तीसरी आँख से देखते हैं और ‘किरपा’ करते हैं. किरपा और आशीर्वाद की बारिश होती है यहाँ, सारे कष्ट मिट जाते हैं. यदि आपकी नौकरी नहीं लग रही-निर्मल बाबा की कृपा से लग जायेगी, अगर आप बीमार हैं और सारे एमबीबीएस, एमएस, एमडी और दूसरी विधाओं के सारे डाक्टर फेल हो चुके हों-तो बाबा के निर्मल दरबार में अर्जी लगाने से वो ठीक हो जाएगा, शादी नहीं हो रही तो, हो बाबा के समागम टीवी चैनेल पर प्रसारित होते हैं...क्या भक्ति चैनेल, क्या मनोरंजन चैनेल और क्या समाचार चैनेल...बाबा ईश्वर(!) की तरह ही सर्वव्यापी हो चुके हैं.
समाचार चैनेलों की वह परमपावन स्वनियामक व्यवस्था क्या यही है? क्या यह भारत की प्रसारण संहिता और संविधान के संगत है? न्यूज़ ब्रोडकास्टर असोसिएशन का क्या काम है? प्रसारण सामग्री शिकायत परिषद के क्या मायने हैं? भारतीय प्रसारण संघ की क्या भूमिका है?
जाहिर है प्रसारण संहिता यह नहीं कहती. और स्वनियामक व्यवस्था में जीवद्रव्य ही नहीं. चैनेल्स अपने लाभ में लगे हैं. खुद निर्मल बाबा ने ‘आज तक’ समाचार चैनेल के साक्षात्कार में यह बात कही कि वे टीवी चैनेलों को पैसे देते हैं और प्रसारण अधिकार हासिल करते हैं. टीवी चैनेल किसी घटना के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देते हैं-मल्टीप्लायर एफेक्ट के अपने अन्तर्निहित गुण के कारण. यह मल्टीप्लायर एफेक्ट व्यवसाय और मार्केटिंग का मूल है.
१३ अप्रैल को शाम के समय चैनेल्स में आलोचना का प्रयास दिखा. इसलिए नहीं कि वे सत्य के मसीहा हैं बल्कि इसलिये कि उन्हें पता है कब टीआरपी कैसे मिलेगी. बिलकुल अन्ना हजारे के आन्दोलन की तरह जब उन्हें आन्दोलन को महिमामंडित करने से टीआरपी मिली तो वो किया, जब बहस से मिल रही थी, बहस करा दी. सबका व्यवसाय खरा चल रहा...’दैहिक दैविक भौतिक तापा; राम राज काहुहिं नहि ब्यापा’. पर यह राम-राज्य सीमित विस्तार में ही है. समाज का हर सदस्य इस ‘दैवीय’ समाज का सदस्य नहीं बन पाता. अर्थात कोई घाटे में है तो वह है समाज का वृहद भाग.
विडम्बना यह है कि किसी भी अमानवीय व्यवस्था का विरोध करने चलिए तो बहुप्रचलित तर्क सामने आते हैं...’लोग चाहते हैं तभी तो यह सब चल रहा है’...’लोगों की आस्था का प्रश्न है’...’आप कौन होते हैं किसी को यह बताने वाले कि क्या होना चाहिये और क्या नहीं’...आदि-आदि. पर क्या सब कुछ वाकई सही है? क्या जिनकी आवाज है उनके तर्क ही मान्य किये जायें? क्या एक अधिक मानवीय, अधिक सभ्य व्यवस्था की मांग करना अस्वाभाविक और अतार्किक है? हमें लगता है यह मांग होनी ही चाहिए. आवाज क्षीण भले ही हो पर उठानी जरूरी है, शक्ति कम ही सही पर उसकी उपस्थिति आवश्यक है.
पुनः यह जानी पहचानी बात है कि झूठ को विश्वसनीय बनाने के लिए उसका सच के साथ एक व्यावहारिक मिश्रण बनाना पड़ता है, चैनेल्स इसी तर्ज पर व्यवसाय करते हैं और आस्था के ये दूकानदार भी...और तो और धर्म स्वयं भी सामजिक सरोकारों की प्रक्षन्नता में बहुधा समाज के लिए ठीक यही काम करता है. धर्म अपने मौलिक स्वभाव में एक स्थिर रहने वाली व्यवस्था है. यह समाज में श्रेणीकरण को न सिर्फ मान्यता देता है बल्कि दैवीय तत्व के दावे के साथ मिलाकर उसे अनुलन्घनीय बना देता है. मानव वास्तविक लौकिक विकास की जगह अलौकिकता की अँधेरी गुफाओं में उन्हें धकेलकर दिव्यता का जश्न मनाता है, अपने लिए मूढ़ अनुयायी बनाये रखना क्या उसके स्वयं के अस्तित्व के लिये जरूरी नहीं? धर्म यह काम स्पष्ट यथार्थ और पारदर्शी रूप में तो कर नहीं सकता इसलिए वह सामजिक सरोकारों की आड़ लेता है.
इन प्रक्षन्न सामजिक सरोकारों की आड़ में जनता ठगी जाती रही है. यहाँ पर जनता का तात्पर्य सिर्फ गरीब जनता ही नहीं और ठगे जाने का मतलब मात्र आर्थिक दान-दक्षिणा ही नहीं है. जनता में वे भी हैं जो या तो अज्ञात के भय में रहते हैं, या बुरे कर्मों में लिप्त हैं और पाप-प्रक्षालन के लिए धर्म/ईश्वर/बाबा का संरक्षण चाहते हैं, या अपने वर्गीय विशेषाधिकार को अक्षुण्ण बनाये रखना चाहते हैं, या तार्किकता उनके लिए अधिक वांछनीय मूल्य नहीं है, या जिन्होंने धर्म की उस आभासी तार्किक (वास्तव में कुतार्किक) बात कि ‘ईश्वर/धर्म आस्था की विषयवस्तु हैं न कि तर्क की’, को शिरोधार्य कर लिया है.
जहाँ तक गरीब/वंचित समूह की इन आस्थाओं की बात है-वहाँ तो वस्तुस्थिति ही ऐसी होती है कि वे अपने भाग्य को अपने हाथों बनता/बिगड़ता देख/समझ ही नहीं पाते. व्यवस्था उन्हें कठपुतली की तरह नचाती है. और वे नाचते हैं. बीमारी/ नौकरी की खोज में जो घोर सापेक्षिक अभाव है, जो मांग और पूर्ति का बेहद असंतुलन है उसे समझना, हल करना...उन्हें स्वयं से तो असंभव ही लगता है, ऎसी स्थिति में क्या कर सकते हैं? वे अपने आप को प्रक्षिप्त कर देते हैं-अपने से उच्चतर दिखती सत्ता के हाथों...धर्म तथा बाबाओं/स्वामियों की शरण में. जो इस अवस्था के दोहन (मौद्रिक और भावनात्मक) के लिए पहले से बैठे होते हैं. व्यक्ति को अपने भविष्य और वर्तमान का दायित्व स्वयं वहन करना असुरक्षित लगता है. किसी अलौकिक शक्ति को समर्पित करने से तनाव का तिरोहन तो होता ही है, पलायन का अवसर भी मिल जाता है और यह उनकी मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक जरुरत है. आस्था के लिए यह आदर्श स्थिति है. है न?
तो क्या निर्मल बाबा के नाम से जो प्रवृत्ति या प्रक्रिया हमारे सामने आई है, वह सरलता से समाप्त होने वाली है? नहीं. वजहें कई हैं. और लक्ष्य बहुत मुश्किल. पहली तो भौतिक परिस्थितियों में मानवीय बदलाव आने चाहिये. आपेक्षिक वंचना न तो वंचित वर्ग के लिए अच्छी है न ही प्रभु वर्ग के लिए. मानवीय गरिमा की समान उदात्त भावनाएं दोनों में मौजूद हैं, आवश्यकता है तो उसे उभारे जाने की, विकसित करने की. यह जटिल कार्य है और बहुविध प्रयास की मांग करता है-दोषरहित लौकिक मूल्यों पर आधारित शिक्षा व्यवस्था, समाज के ध्येयों के अनुरूप आर्थिक-सामजिक-सांस्कृतिक परिवेश का सृजन आदि. यह उच्च और अधिक मानवीय वातावरण एक वृहद सामाजिक दृष्टिकोण से ही निर्मित हो सकता है न कि परमाणु की भांति मनुष्य को स्वतंत्र कण मानने से. दूसरी बात वैज्ञानिक और तार्किक दृष्टिकोण के समुचित विकास के बिना पारलौकिकता और चमत्कारों से हम मुक्त नहीं हो पाएंगे. तीसरी बात धर्म की सार्वजनिक उपस्थिति तो कम से कम खत्म ही करनी पड़ेगी, बल्कि निजी जीवन में भी धर्म की भूमिका सीमित करनी होगी. प्रश्न उठता है कि निजी जीवन से क्यों? क्योंकि ‘व्यक्तिगत ही सार्वजनिक है’ अर्थात निजी और सार्वजनिक व्यवहार में पृथकता संभव ही नहीं. यह आप किसी भी सार्वजनिक व्यक्तित्व के आचरण से सरलता से प्रमाणित कर सकते हैं. यह हमारे सार्वजनिक जीवन में धर्मनिरपेक्षता के विकास के लिए भी महत्वपूर्ण होगा. जब हमारा जीवन लौकिक दृष्टिकोण से संचालित होगा तो हमारे कृतिम भेद मिटेंगे, नागरिकता की समान भावना से संचालित होकर हम अपने गणतंत्र के मान्य आदर्शों की तरफ बढ़ पाएंगे और एक स्वस्थ नागरिक समाज निर्मित कर पायेंगे.

                                                                                                                                                                                                                                                                                     -महेश
प्रेमचंद के साहित्य को समझने की कोशिश.


प्रेमचंद के साहित्य को समझने की मेरी कोशिश एक अतिसामान्य पाठक की कोशिश समझी जानी चाहिए. मैंने उनके उपन्यास-गोदान, सेवासदन, निर्मला, रंगभूमि पढ़ा और अनेक कहानियां पढ़ीं, साहित्य का श्रेय-प्रेय सम्बन्धी उनका वक्तव्य पढ़ा, उनके साहित्य के बारे में अनेक परवर्ती लेखकों के विचार जाने. और इन्ही सब से मेरी समझ उनके बारे में बनी.
मेरी समझ में प्रेमचंद जी एक बेहतरीन कथाकार हैं. खासकर ग्रामीण सामंती समाज, परिवार की जो उनकी कथाएं हैं वे पोर्ट्रेट लगती हैं. अगर आप वैसे समाज के हिस्से रहे हैं तो आप को साफ़ दिखेगा कि वो एक वृत्त-चित्र बना रहे हैं...न सिर्फ यह यथा-तथ्य का चित्रण होगा बल्कि उस जीवन का जो खोखलापन होगा उसको भी  बड़ी ही सरलता से आप को बता देंगे. एक अच्छे जीवन का संकेत सूत्र भी होगा उसमे. ईदगाह कहानी का हामिद हमारे परिष्कार में कितना उपयोगी हुआ है इसका कोई माप नहीं हो सकता, बच्चे हामिद का अभाव उसमे कमजोरी नहीं लाता वरन अभाव को भी अपनी प्रत्युत्पन्नमति से उसे अवसर में बदलने की उसकी सफलता साथ में ही मानवीय प्रेम का गहन क्षण हमें उन्नत करता है. बूढी-काकी नामक कहानी मेरी प्रिय कहानियों में से है. इस कहानी में भूख का जो जीवंत चित्रण है वह पाठक के सारे अस्तित्व को रोने पर बाध्य कर देता है. अमानवीयता से बचने का सशक्त सांवेगिक-प्रभाव छोडती है ये कहानी. एक कहानी जिसकी चर्चा कम होती है वह है-गुल्ली-डंडा. दो मित्रों की यह कहानी अत्यंत सफल मनोवैज्ञानिक कहानी है. सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण मित्रों में जो दूरी आ जाती है उसका प्रतिफलन रिश्तों में कैसे होता है इसका बेहतरीन उदाहरण है.
उनकी बहुप्रशंसित कहानियों कफ़न, पूस की रात आदि का तो कहना ही क्या? कफ़न में समाज के ढोंग को कितना सहज ढंग से संप्रेषित किया है यह उसे एक विशिष्ट कहानी बनाता है.भूख कितना बड़ा संवेग है इसको वही समझ सकते हैं जो इसे भोगते हैं. भोक्ता के अलावा इसे यदि कोई थोडा-बहुत समझ सकता है तो-वह एक सशक्त कलाकृति ही हो सकती है... प्रेमचंद की कहानी हो सकती  है, किसी चित्रकार का चित्र हो सकता है या एक फिल्म हो सकती है.
रंगभूमि नामक उनका उपन्यास एक कृति की दृष्टि से अत्यंत श्रेष्ठ लगती है मुझे. सूरदास के उदात्त चरित्र को बहुत अच्छे से सिरजा है प्रेमचंद जी ने. अहिंसात्मक आंदोलन की परिस्थिति-जन्य अपरिहार्यता का सहज चित्रण हो जाता है इस रचना में. ब्रितानी समाज का, भारतीय समाज के तत्कालीन अभिजात वर्ग का भी बड़ा प्रामाणिक चित्रण हो जाता है. हालाँकि अहिंसात्मक आंदोलन की जो सीमाएं हैं वो ही इस कृति की सीमायें भी बन जाता है.
गोदान उनका बेहतरीन उपन्यास है. कुछ साहित्यकार उसे अर्ध-उपन्यास, दो-उपन्यास मानते हैं. पर हमें तो  यथार्थ का एक बड़ा वितान रचने वाला यह उपन्यास एक सशक्त महागाथा ही लगता है. जैसे यथार्थ में सीमा-रेखा खींचना संभव नहीं वैसे ही एक अच्छी कृति में भी यह मुमकिन नहीं. धर्म के शोषक रूप का जो सहज, निरावृत चित्रण प्रेमचंद जी ने इस कृति में किया है वह दुर्लभ है...वह दुर्लभ इसलिए है कि रचना पाठक से यह कहलाने में सफल हो जाती है कि 'अरे धर्म लोगों को त्राण से छुटकारा दिलाने के लिए है या स्वयं शोषण का उपकरण'. एक निबंध यह काम नहीं कर सकता क्योंकि उसमे वह प्रभावोत्पादकता नहीं होती, वह पाठक को वैसे झंकृत नहीं कर सकता जैस एक जीवन-वृत्त.
कुल मिलाकर प्रेमचंद जी का साहित्य एक बेहतरीन मानव,  बेहतरीन समाज बनाने में बहुत कीमती भूमिका अदा करता है. जिसे भी ग्रामीण समाज की समझ बढानी है...हिंदी पट्टी के भारत को समझना है..एक बेहतरीन इंसान बनना है उसे प्रेमचंद साहित्य का अनुशीलन अवश्य करना चाहिए.

Tuesday, 19 June 2012

निर्मला पुतुल की कविता.
आदि वासी कविता कैसी हो सकती है?????????? देखिये निर्मला पुतुल की कुछ कवितायेँ:


अगर तुम मेरी जगह होते


ज़रा सोचो, कि
तुम मेरी जगह होते
और मैं तुम्हारी
तो, कैसा लगता तुम्हें?

कैसा लगता
अगर उस सुदूर पहाड़ की तलहटी में
होता तुम्हारा गाँव
और रह रहे होते तुम
घास-फूस की झोपड़ियों में
गाय, बैल, बकरियों और मुर्गियों के साथ
और बुझने को आतुर ढिबरी की रोशनी में
देखना पड़ता भूख से बिलबिलाते बच्चों का चेहरा तो, कैसा लगता तुम्हें?


हमारी संवेदना को कैसे चुनौती सी देती हुई ये कविता कैसे ललकार रही है. नागर सभ्यता को, समाज की मुख्य-धारा को, हमारे सुविधाजनक संसार को. पुनः देखिये: 

कैसा लगता
अगर तुम्हारी बेटियों को लाना पड़ता
कोस भर दूर से ढोकर झरनों से पानी
और घर का चूल्हा जलाने के लिए
तोड़ रहे होते पत्थर
या बिछा रहे होते सड़क पर कोलतार, या फिर
अपनी खटारा साइकिल पर
लकड़ियों का गट्टर लादे
भाग रहे होते बाज़ार की ओर सुबह-सुबह
नून-तेल के जोगाड़ में!


कैसा लगता, अगर तुम्हारे बच्चे
गाय, बैल, बकरियों के पीछे भागते
बगाली कर रहे होते
और तुम, देखते कंधे पर बैग लटकाए
किसी स्कूल जाते बच्चे को.



हमारी संवेदना को कैसे झकझोर रही है कविता? व्यवस्था सीमांत के लोगों से कैसे बर्ताव करती है...देखिये...और ये भी देखिये अगर ये समीकरण बदल जाये तो क्या होगा?



जरा सोचो न, कैसा लगता?
अगर तुम्हारी जगह मैं कुर्सी पर डटकर बैठी
चाय सुड़क रही होती चार लोगो के बीच
और तुम सामने हाथ बाँधे खड़े
अपनी बीमार भाषा में रिरिया रहे होते
किसी काम के लिए

सोचो, कि कुछ देर के लिए ही सोचो, पर सोचो,
कि अगर किसी पंक्ति में तुम
सबसे पीछे होते
और मैं सबसे आगे और तो और
कैसा लगता, अगर तुम मेरी जगह काले होते
और चिपटी होती तुम्हारी नाक
पाँवो में बिवाई होती ?
और इन सबके लिए कोई फब्ती कस
लगाता ज़ोरदार ठहाका
बताओ न कैसा लगता तुम्हे...?
कैसा लगता तुम्हें...?




कैसा लगा ये कविता पढकर...अगर आपमें सहानुभूति है...आप उससे एक कदम आगे जाना चाहते हैं...यानी समनुभूति(एम्पथी) की तरफ...आपमें ज्ञानात्मक संवेदन जगाने के लिए शायद यह एक बेहतरीन प्रस्थान बिंदु है.
एक दूसरी कविता देखिये:

आदिवासी स्त्री 

उनकी आँखों की पहुँच तक ही
सीमित होती उनकी दुनिया
उनकी दुनिया जैसी कई-कई दुनियाएँ
शामिल हैं इस दुनिया में / नहीं जानतीं वे

वे नहीं जानतीं कि
कैसे पहुँच जाती हैं उनकी चीज़ें दिल्ली
जबकि राजमार्ग तक पहुँचने से पहले ही
दम तोड़ देतीं उनकी दुनिया की पगडण्डियाँ

नहीं जानतीं कि कैसे सूख जाती हैं
उनकी दुनिया तक आते-आते नदियाँ
तस्वीरें कैसे पहुँच जातीं हैं उनकी महानगर
नहीं जानती वे ! नहीं जानतीं ! !

क्या  कहती है ये कविता? ये कविता आदिवासी समाज की पोलिटिकल-इकोनोमी को बड़े सरल शब्दों में बताती है...यहाँ किसी व्याख्या की कोई जरुरत नहीं...कविता अपने आप में बयान भी है और व्याख्या भी. ऐसी ही अनेक कविता रचने वाली निर्मला पुतुल जी की कविता में लाचारगी नहीं, चुनौती है, समर्पण नहीं, ललकार है. एक और कविता जिसमे एक आदिवासी लड़की अपने विवाह के लिए सही स्थान और पात्र के चयन की बात है बड़ी सहज-सरल कविता, सुन्दर और श्रेष्ठ कविता...

उतनी दूर मत ब्याहना बाबा !

बाबा!
मुझे उतनी दूर मत ब्याहना
जहाँ मुझसे मिलने जाने ख़ातिर
घर की बकरियाँ बेचनी पड़े तुम्हे

मत ब्याहना उस देश में
जहाँ आदमी से ज़्यादा 
ईश्वर बसते हों

जंगल नदी पहाड़ नहीं हों जहाँ
वहाँ मत कर आना मेरा लगन 

वहाँ तो कतई नही
जहाँ की सड़कों पर
मान से भी ज़्यादा तेज़ दौड़ती हों मोटर-गाडियाँ
ऊँचे-ऊँचे मकान 
और दुकानें हों बड़ी-बड़ी


उस घर से मत जोड़ना मेरा रिश्ता
जिस घर में बड़ा-सा खुला आँगन न हो
मुर्गे की बाँग पर जहाँ होती ना हो सुबह
और शाम पिछवाडे से जहाँ 
पहाडी पर डूबता सूरज ना दिखे ।

मत चुनना ऐसा वर 
जो पोचाई और हंडिया में 
डूबा रहता हो अक्सर 

काहिल निकम्मा हो 
माहिर हो मेले से लड़कियाँ उड़ा ले जाने में
ऐसा वर मत चुनना मेरी ख़ातिर

कोई थारी लोटा तो नहीं 
कि बाद में जब चाहूँगी बदल लूँगी
अच्छा-ख़राब होने पर

जो बात-बात में 
बात करे लाठी-डंडे की
निकाले तीर-धनुष कुल्हाडी
जब चाहे चला जाए बंगाल, आसाम, कश्मीर 
ऐसा वर नहीं चाहिए मुझे
और उसके हाथ में मत देना मेरा हाथ
जिसके हाथों ने कभी कोई पेड़ नहीं लगाया 
फसलें नहीं उगाई जिन हाथों ने
जिन हाथों ने नहीं दिया कभी किसी का साथ
किसी का बोझ नही उठाया.
ये कवितायेँ न सिर्फ आदिवासी समाज की गाथाएं है बल्कि एक बेहतर मानवीय समाज भी इनमें अंतर्भुक्त है.

आज भारत के प्रधानमन्त्री ने यूरो-जोन को संकट से उबारने के लिए १० अरब डालर दिया. मुझे तत्काल पता नहीं क्यों कुछ बातें याद आयीं:
भारत के ४६% बच्चे कुपोषित हैं...
मानव विकास रिपोर्ट में हमारी स्थिति १३३ वीं है...
पिछले ३३ वर्ष में सरकार ने सड़ते अनाज के लिए एक भी गोदाम नहीं बनाया...
सरकारी आंकड़ों के आधार पर भी ७७% भारतीय २० रुपये प्रतिदिन से कम पर गुजर बसर करते हैं...
पर हमारी सरकार ने पता नहीं किस प्रतिबद्धता के तहत अच्छे खासे जीवन स्तर रखने वाले यूरोपीय देशों की अर्थ-व्यवस्था को संकट से उबारने में अपना योगदान देना चाहती है...खैर हो सकता हमारी समझ का दायरा छोटा हो, हमारी सरकार के बारे में अवधारणा गलत हो...इसे कोई भी कोरी भावुकता कह सकता है...