कॉमिक विडंबना
जिन लोगों का मूर्तियों में यकीं नहीं वे तोड़ने का विरोध कर रहे हैं और जिन्हे प्रतिनायक और खलनायक की भी मूर्तियों को बनाने और पूजने का शौक है वे नायकों की मूर्तियां तोड़ रहे हैं.
यह उस सन्दर्भ में है जब भाजपा की सरकार त्रिपुरा में बनने के बाद बुलडोज़र से लेनिन की मूर्ति ढहायी गयी थी.
मूर्तियों को लेकर मेरे मन में काफी समय से एक नाज़ुक-सा तिरस्कार है. यह मैं निश्चित रूप से नहीं कह सकता कि मूर्तियों का होना, उनका पूजा जाना, उनमें अपनी शृद्धा टिकाना कितना ज़रूरी या गैर-ज़रूरी है.
हमारे अपने देश का अनुभव तो यही बताता है कि इसके नुक्सान ही ज़्यादा हैं, फायदे कम.
बुद्ध और महावीर ने इसका विरोध किया अब उनके अनुयायी भी उनको idolize करके पूजते हैं, उनके विचारों से उतनी प्रेरणा नहीं लेते हुए लगते हैं. ऐसे ही गांधी जी को, आंबेडकर जी को हमने पढ़ने और ठीक से मानने के बजाय पूजना शुरू कर दिया.
यह उस सन्दर्भ में है जब भाजपा की सरकार त्रिपुरा में बनने के बाद बुलडोज़र से लेनिन की मूर्ति ढहायी गयी थी.
मूर्तियों को लेकर मेरे मन में काफी समय से एक नाज़ुक-सा तिरस्कार है. यह मैं निश्चित रूप से नहीं कह सकता कि मूर्तियों का होना, उनका पूजा जाना, उनमें अपनी शृद्धा टिकाना कितना ज़रूरी या गैर-ज़रूरी है.
हमारे अपने देश का अनुभव तो यही बताता है कि इसके नुक्सान ही ज़्यादा हैं, फायदे कम.
बुद्ध और महावीर ने इसका विरोध किया अब उनके अनुयायी भी उनको idolize करके पूजते हैं, उनके विचारों से उतनी प्रेरणा नहीं लेते हुए लगते हैं. ऐसे ही गांधी जी को, आंबेडकर जी को हमने पढ़ने और ठीक से मानने के बजाय पूजना शुरू कर दिया.
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