Sunday, 8 July 2018

आखिर हमारी सभ्यता ने सत्य, न्याय और समानता पर कितना विचार किया?


सभ्यता के रूप में हम भारतीय बहुत पुराने हैं. संस्कृति और सभ्यता का इतिहास पुराना है. दर्शन, साहित्य, वास्तु, कीमियागरी और आयुर्विज्ञान की हमारी बड़ी ही समृद्धिशाली और दुनिया की अन्य सभ्यताओं से तुलनीय विरासत है.


लेकिन, मुझे सच में यह नहीं पता कि न्याय और समानता जैसे सार्वजनीन मानवीय मूल्यों पर वेद, उपनिषद और पुराणों में क्या है?

उदाहरण के लिए, क्या कहीं सच के स्वरुप को समझने की कोशिश है? क्या लौकिक मायनों में शास्त्रीय ढंग से कोई विचार हुआ है?

न्याय के बारे में क्या सोचा था हमारे मनीषियों ने?


बंधुता, और स्वतंत्रता अपेक्षाकृत नए मूल्य हैं, इसलिए इस पर उतनी चर्चा इन ग्रंथों में शायद न हुयी हो?


चूँकि एथेंस में सुकरात उपनिषद काल के भारत के समय ही सत्य, न्याय आदि अवधारणाओं पर द्वंद्वात्मक ढंग से विचार कर रहे थे. प्रामाणिक रूप से खंडन मंडन कर रहे थे. सुकरात की पूरी शैली इस बात का प्रमाण है कि वे सत्य के किसी स्थिर स्वरुप को मानने को तैयार नहीं थे. वे हर तरह के सत्य-कथन आदि की परीक्षा करते थे और लोगों का आह्वान करते थे कि वे भी वैसा ही करें. 


इस तरह के प्रयास हमारे देश में कितने हुए, यह जानने का मन करता है. 


जितना भारतीय दर्शन मैंने पढ़ा है उसमें आध्यात्मिक पक्ष पर ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर दिखता है. सत्य, न्याय आदि की स्थिर धारणाओं, उनके पारलौकिक अर्थों पर बलाघात स्पष्ट है. 

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