संस्कृति और समाज
संस्कृति (साहित्य और अन्य कलाएं) और समाज के रिश्ते पर वाम ने गंभीर विमर्श किया है. हालाँकि, मार्क्स और वाम पर एक आरोप हमेशा लगता रहता है कि आर्थिक-सामाजिक पक्ष पर उनका जोर इतना ज़्यादा है कि वे व्यक्तिगत उद्यम/ प्रेरणा को कोई महत्त्व नहीं देते. कि सबकी समानता पर बल देने से कला और संस्कृति तो पंगु और एकरस हो जाएगी, कि कला राजनीतिक हो जाएगी तो व्यक्ति को उद्वेलित नहीं कर पाएगी, कि मनुष्य में केवल आर्थिक प्रेरणा नहीं काम कर रही होती है...आदि, आदि. और यह चूक बड़े-बड़े मान्य लेखक/कवि भी करते हुए दिखते हैं: कुंवर नारायण, निर्मल वर्मा को हाल ही में पढ़ा है. वाम-पक्ष का लेखन करने वाले भी कई लोगों ने कला को राजनीतिक नारे की तरह लिया, उसकी संश्लिष्टता को नहीं आत्मसात किया जिससे द्वितीयक/ तृतीयक दरज़े की कलाकृतियां सामने आयीं. और वे ढेर में हैं.
किन्तु, जिन्होंने मार्क्स को या वाम-विचार की पुस्तकों को ज़्यादा गंभीरता से देखा है उन्हें मार्क्स के छुटपुट विचारों से उनके विकसित सौंदर्य-चिंतन की झलक मिलती है.
मार्क्स के अनुसार, हमारी इन्द्रियां ही कला का आस्वाद लेती हैं, इन्द्रियां ही कला को सृजित करती हैं और यह इन्द्रियां सामाजिक पक्ष को/से एक्सपोज़ रहती हैं ऐसे में कला की पूर्णतः व्यक्तिवादी और रहस्यवादी अवधारणा त्रुटिपूर्ण है. हाँ, यह अलग बात है कि यह सम्बन्ध अंकगणितीय किस्म का नहीं होता है, इसमें व्यक्ति का अंतस भी शामिल होता है. व्यक्ति के अंतस की जटिलता और सामाजिक-सांस्कृतिक जटिलता और उनकी विरासत उसके अंदर सक्रिय रहती है.
उनके विचारों को क्रमबद्ध रूप से मिखाइल लिफ्सिटज ने पुस्तकाकार व्यवस्थित किया था. जिनकी इस विषय में रूचि है उनके लिए पुस्तक की लिंक दे रहे हैं. इस पुस्तक के अलावा इसी विषय पर प्लेखानोव ने 'कला का सामजिक उद्भव' नाम की पुस्तक लिखी है जिसमें बड़े ही प्रामाणिक ढंग से यह दर्शाया गया है कि कला का उद्भव सामाजिक है न कि किसी दैविक प्रेरणा या जन्मजात प्रतिभा का विस्फोट.
No comments:
Post a Comment