Monday, 16 July 2018

येसिजुरो ओज़ू का सिनेमा और मेरा जापान से प्रेम

येसिजुरो ओज़ू का सिनेमा और मेरा जापान से प्रेम शीर्षक आपको कुछ अजीब लग रहा होगा. पर मैं आपको एक निजी बात बताऊँ. जापान के बारे में जो भी जानकारी रही है मेरी वह है कि यह ऐसा देश है जहाँ तकनीक से बहुत प्रेम है, कि इस देश की तकनीक बहुत उन्नत है, कि यहाँ लोगों की उम्र काफी बढ़ गयी है, कि बूढ़े लोगों की ठीक से देखभाल नहीं हो पाती, कि यहाँ के लोग साफ़-सफाई बहुत पसंद करते हैं, कि जापानी लोग बहुत अनुशासित होते हैं, कि उनका देश-प्रेम बहुत श्रेष्ठ स्तर का है, इतना कि वे कुछ भी कर रहे हों, राष्ट्र-गान शुरू होते ही सब खड़े हो जाते हैं.


उनके राष्ट्र-प्रेम को लेकर एक मीठी-सी जलन तो हमेशा से महसूस होती रही है कि हमारे देश के लोग इस तरह से अपने देश को प्रेम क्यों नहीं करते! एक बचकानी-सी, उलाहना भरी आकांक्षा थी/ है शायद!


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जापानी फिल्मकार यासिजुरो ओज़ू (साभार गूगल) 

मेरी यह जानकारी वहां के फिल्मकार ओज़ू की फिल्मों को देखने से पहले की हैं. नहीं कह सकता कि मेरी जानकारी में कोई उल्लेखनीय वृद्धि अभी भी हो पायी है क्या. लेकिन जापान को लेकर एक तरह का प्रेम विकसित हुआ, सिर्फ ओज़ू की फिल्मों को देखकर!




किसी कलाकार की कला क्या कर सकती है, मुझे कभी इतनी शिद्दत से महसूस नहीं हुयी, जितनी ओज़ू की फ़िल्में देखकर हुयी!





सबसे पहले उनकी बहुचर्चित टोकियो स्टोरी देखी। श्वेत-श्याम में, १९५३ की फ़िल्म। शुरुआत में लगा कि अरे यह कितना स्लो है. अरे कितने साधारण संवाद हैं. क्या इसमें उल्लेखनीय है भला?

साभार-गूगल
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                     साभार-गूगल 












कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है तो बॉलीवुड की इसी थीम पर बनी फ़िल्म बागबाँ याद आने लगती है और जाने -अनजाने एक तुलना शुरू हो जाती है. 
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साभार-गूगल 
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साभार-गूगल 
  



माँ-बाप के लिए बच्चों का प्रेम/ देखभाल किस रूप में चल रहा है, इसमें आप शरीक़ हो जाते हैं. 

बागबाँ अपने निरूपण में कितनी शोरभरी और रूखी  है! इतनी लाउड है कि सच नहीं लगती।

 हिंदी-सिनेमा के दर्शक को शायद इसी रूप में देखा जाता है, इसी रूप में उसका दर्शक के रूप में विकास किया गया है!

 खैर, उन्ही बातों को लेकर टोकियो स्टोरी इतने शांत तरीके से आगे बढ़ती है कि दर्शक के रूप में आप उस कहानी को ज़्यादा लीं होकर देख पाते हैं. 

ओज़ू के निरूपण में आपको कटुता नहीं, बल्कि धीरज मिलेगा; ध्वंस करने वाली आलोचना नहीं, बल्कि आत्म को पोषित करने वाली दृष्टि मिलेगी, सच को विनम्रता से देख पाने का सलीका मिलेगा.

ओज़ू की फ़िल्म में हाथ से अखबार खींचने जैसे प्रकट अपमान की ज़रूरत नहीं पड़ती, या यूँ कहिये कि घटना को इतने अश्लील तरीक़े से नहीं दिखाते.
फ़िल्म बागबाँ का एक दृश्य जब बहू अख़बार छीनती है (साभार-यूट्यूब)


ओज़ू तो बेटी से अच्छी मिठाई अपने माता-पिता को देने की ज़रूरत नहीं है, इस भंगिमा से ही अपनी बात कह ले जाते हैं. बागबाँ में माँ-बाप यह कहते हैं कि बच्चों को उनकी फ़िक्र ही नहीं है, टोकियो स्टोरी में पिता साधारण देखभाल के प्रश्न पर कहता है 'हम बच्चों से बहुत ज़्यादा की उम्मीद नहीं कर सकते. उनका भी तो जीवन है.'

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टोकियो स्टोरी का एक दृश्य (साभार- गूगल) 


जब आप ओज़ू की अन्य फिल्में देखते हैं तो आपको इस व्यक्ति पर और ज़्यादा शृद्धा हो जाती है. 1949 की फ़िल्म लेट स्प्रिंग जिसमें बाप-बेटी के सम्बन्ध को कितनी आत्मीयता और प्यार से दिखाया है! आप मुग्ध हो जाते हैं. इस फ़िल्म में बेटी इसलिए शादी नहीं करना चाहती है कि पिता अकेले हो जाएंगे, उनकी देखभाल कौन करेगा..फिर किसी ने बेटी से बोला कि उसके पिता ख़ुद शादी करने वाले हैं तो वह इस बात से गुस्सा होती है कि माँ को कैसे भुला सकते हैं और अपने पिता से रूखेपन से पेश आने लगती है. चूंकि पिता को तो यह पता नहीं है वे वैसी ही कोमलता से बेटी से पेश आते रहते हैं. बेटी को शादी के लिए तैयार करते हुए बड़ा ही सुंदर वार्तालाप होता है. 

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फिल्म लेट स्प्रिंग का एक दृश्य (साभार-गूगल)

"बेटी: पापा, मैं आपके साथ ही रहना चाहती हूँ. मैं कहीं नहीं जाना चाहती हूँ. मैं केवल आपके साथ रहना चाहती हूँ. मैं बिलकुल ख़ुश हूँ. शादी भी मुझे इससे ज़्यादा ख़ुश नहीं कर सकती. मैं पर्याप्त ख़ुश हूँ. 


पिता: हाँ, लेकिन...

बेटी: न, न. आपको शादी करनी है तो कर लीजिये. मैं तो केवल आपके पास रहना चाहती हूँ. मैं आपको बहुत ज़्यादा  पसंद करती हूँ. 


मेरी सबसे बड़ी ख़ुशी आपके साथ रहने में है. 

मुझे पता है कि शादी से मैं अभी से ज़्यादा खुश नहीं हो पाऊंगी.

पिता: नहीं, यह सही नहीं है. देखो, मैं अभी 56 वर्ष का हो गया हूँ और मेरा अंत निकट ही है. नए जीवन के लिए 
तुम्हारा तो अभी पहला कदम है. जीवन जो तुम और सरकाटे (भावी पति) मिलकर संवारोगे. 

केवल पापा के साथ ही बने रहना है!

दुनिया मेरे अलावा भी है.  इंसान का जीवन 
ऐसे ही है और ऐसे ही सभ्यता आगे बढ़ती रही है.

हो सकता है कि शादी शुरुआत से ही ख़ुशी न दे पाए, किन्तु सबको आगे बढ़कर इस ख़ुशी का इंतज़ार करना चाहिए.

सच्ची ख़ुशी कभी भी दी हुयी नहीं होती। इसके लिए तो काम करना पड़ता है. शादी ख़ुशी नहीं। यह तो मिल-जुलकर नया जीवन बुनना है, और यही ख़ुशी है. इसमें एक साल भी लग सकता है, कई भी लग सकते हैं. कभी-कभी तो 5 से 10 साल भी लग जाते हैं.

ख़ुशी तो कोशिश करने पर ही आती है. और तभी तुम पति-पत्नि होने का सच्चा दावा कर सकते हो.

.. 


..

अभी तक जितना प्रेम मुझे किया है वह सबका-सब सरकाटे को मिलना चाहिए.
और इससे ही सच्ची ख़ुशी आएगी."



(बेटी शादी के लिए तैयार हो जाती है.)

(फ़िल्म के इस अंश के वार्तालाप का मेरे द्वारा किया गया अनुवाद).






Sunday, 8 July 2018

कॉमिक विडंबना
जिन लोगों का मूर्तियों में यकीं नहीं वे तोड़ने का विरोध कर रहे हैं और जिन्हे प्रतिनायक और खलनायक की भी मूर्तियों को बनाने और पूजने का शौक है वे नायकों की मूर्तियां तोड़ रहे हैं.


यह उस सन्दर्भ में है जब भाजपा की सरकार त्रिपुरा में बनने के बाद बुलडोज़र से लेनिन की मूर्ति ढहायी गयी थी.

मूर्तियों को लेकर मेरे मन में काफी समय से एक नाज़ुक-सा तिरस्कार है. यह मैं निश्चित रूप से नहीं कह सकता कि मूर्तियों का होना, उनका पूजा जाना, उनमें अपनी शृद्धा टिकाना कितना ज़रूरी या गैर-ज़रूरी है.

हमारे अपने देश का अनुभव तो यही बताता है कि इसके नुक्सान ही ज़्यादा हैं, फायदे कम.

बुद्ध और महावीर ने इसका विरोध किया अब उनके अनुयायी भी उनको idolize करके पूजते हैं, उनके विचारों से उतनी प्रेरणा नहीं लेते हुए लगते हैं. ऐसे ही गांधी जी को, आंबेडकर जी को हमने पढ़ने और ठीक से मानने के बजाय पूजना शुरू कर दिया.     
आखिर हमारी सभ्यता ने सत्य, न्याय और समानता पर कितना विचार किया?


सभ्यता के रूप में हम भारतीय बहुत पुराने हैं. संस्कृति और सभ्यता का इतिहास पुराना है. दर्शन, साहित्य, वास्तु, कीमियागरी और आयुर्विज्ञान की हमारी बड़ी ही समृद्धिशाली और दुनिया की अन्य सभ्यताओं से तुलनीय विरासत है.


लेकिन, मुझे सच में यह नहीं पता कि न्याय और समानता जैसे सार्वजनीन मानवीय मूल्यों पर वेद, उपनिषद और पुराणों में क्या है?

उदाहरण के लिए, क्या कहीं सच के स्वरुप को समझने की कोशिश है? क्या लौकिक मायनों में शास्त्रीय ढंग से कोई विचार हुआ है?

न्याय के बारे में क्या सोचा था हमारे मनीषियों ने?


बंधुता, और स्वतंत्रता अपेक्षाकृत नए मूल्य हैं, इसलिए इस पर उतनी चर्चा इन ग्रंथों में शायद न हुयी हो?


चूँकि एथेंस में सुकरात उपनिषद काल के भारत के समय ही सत्य, न्याय आदि अवधारणाओं पर द्वंद्वात्मक ढंग से विचार कर रहे थे. प्रामाणिक रूप से खंडन मंडन कर रहे थे. सुकरात की पूरी शैली इस बात का प्रमाण है कि वे सत्य के किसी स्थिर स्वरुप को मानने को तैयार नहीं थे. वे हर तरह के सत्य-कथन आदि की परीक्षा करते थे और लोगों का आह्वान करते थे कि वे भी वैसा ही करें. 


इस तरह के प्रयास हमारे देश में कितने हुए, यह जानने का मन करता है. 


जितना भारतीय दर्शन मैंने पढ़ा है उसमें आध्यात्मिक पक्ष पर ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर दिखता है. सत्य, न्याय आदि की स्थिर धारणाओं, उनके पारलौकिक अर्थों पर बलाघात स्पष्ट है. 
मुहावरा-निर्मित समझ?


मुझे लगता है कि हमारी चेतना का, या यूं कहिये कि सामान्य समझ का बड़ा हिस्सा उक्ति/ सूक्ति-कथनों, मुहावरों, चुटकुलों से निर्मित है।


मुहावरे, कथन आदि संचित ज्ञान के हिस्से होते हैं और कई बार वे समय की परीक्षा में खरे भी उतरते हैं। लेकिन उनका यथार्थ से संबंध कभी-कभी बड़ा उथला और सामान्यीकृत किस्म का होता है जो नयी परिस्थितियों में लागू होते समय कई बार उथली समझ और उथले निर्णयों का कारण भी बनता है.


 लेकिन, चूंकि ये कथन-मुहावरे-उक्तियाँ सामान्य बोध का हिस्सा होती हैं और इस नाते यथार्थ के साथ उथला/ उल्टा सम्बन्ध भी बड़ा स्वाभाविक सा और वैध लगता है।


मुझे लगता है कि यह नयी परिस्थितियों की समझ और उनके सही विश्लेषण को बाधित करता है। इसलिये इनका समय-समय पर परीक्षण करते रहना चाहिए, इनकी सीमायें उद्घाटित करते रहना  विशिष्ट महत्त्व का मानना चाहिए।
संवेदनशील व जिम्मेदार लोग अपने समय की कुरूपताओं के क्रिटीक होते हैं। (सामान्य क्रिया कलापों के समर्थन की ज़रूरत नहीं होती है, क्योंकि वह तो अपेक्षित ही होता है।)
उनका क्रिटीक शब्दों में व्यक्त हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है, उनके कर्मों में ज़रूर होता है।
मसलन, एक सांविधानिक व्यवस्था के नागरिक/ग्रामीण और कार्मिक की निष्ठा संविधान के आधारभूत मूल्यों की रक्षा में देखी जा सकती है। (जैसे अपने देश के संदर्भ में-न्याय, स्वतंत्रता, समानता, कमजोरों का, ख़ासकर कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति का संरक्षण, कानून का शासन इत्यादि।)
इन मूल्यों से बढ़कर उसके लिए कुछ नहीं होना चाहिए। इन मूल्यों की रक्षा ही एक व्यक्ति की, संस्था की कसौटी होने चाहिए।
इन प्रतिबद्धताओं से खुद को भी जांचना चाहिए, अपने संगी-साथियों को भी और अपने संस्थानों को भी।
क्या इस मानक को लेकर भी दो-राय हो सकती है??
सूचना के माध्यम यदि सच्चे, ईमानदार और संवेदनशील नहीं हैं, यदि वे जिम्मेदार नागरिक-समाज के गठन में अपनी भूमिका नहीं समझते हैं तो उनका बहिष्कार करना चाहिए।
उदाहरण के लिए, दैनिक ...गरल. मैंने तो कभी पसंद नहीं किया, लेकिन इस व्यक्तिगत बहिष्कार से जरूरी है: घोषित बहिष्कार।
मुझे लगता है कि alt news जैसे प्लेटफॉर्म, जो समाज में झूठ फैलाने वालों को बेनकाब करते हैं, को वह पैसे देने चाहिए बजाय कि कूड़ा-करकट पढ़ने-देखने में जाया करने और बदले में मन में जहर भरने के।
Babam.ve.Oglum तुर्की भाषा की इतनी प्यारी-परिपक्व फ़िल्म है कि इसे बार-बार देखते हैं, बार-बार पसंद आती है, हर बार आँखें भीगती हैं और हमेशा सराहते हैं।
पिता-पुत्र संबंध पर तो इतनी सुंदर शायद ही कोई फ़िल्म हो!
गहरे अर्थों में मनोवैज्ञानिक... अपने देश की तरह का सामाजिक ताना-बाना...प्यारे-से रिश्ते...बचपन की आँखों से दुनिया... मां की आंख से बेटा और पोता....बेटे से नाराज व्यक्ति को पोते के माध्यम से पिघलाना/पिघलना... बहन-बहन का रिश्ता... भाई-भाई का रिश्ता...सब कुछ इतने विश्वसनीय तरीके से, इतनी कोमलता से दर्शाया है कि अगर एक सम्पूर्ण फ़िल्म का नाम पूछा जाय तो इसी का नाम लेंगे हम।
अगर फ़िल्म को एक माध्यम के रूप में सराहते हैं तो इसे ज़रूर देखिये।
कभी न भूलने वाला अनुभव मिलेगा।
व्यक्ति के रूप में आप थोड़े समृद्ध भी होंगे।
साहित्य का आत्म-सत्य
निर्मल वर्मा की इस शीर्षक की पुस्तक बहुत अच्छी लगी. उनके भाषणों, साक्षात्कारों और निबंधों का संग्रह है. उनका गद्य श्रेष्ठ है. भाषा, साहित्य, जातीय चेतना, विचार और विचारधारा पर सम्यक रौशनी डाली है. बहुत पठनीय है.
उनका मानना है कि लेखन में विचार की ज़रूरत है लेकिन विचारधारा की नहीं. उनके अनुसार ' जहाँ विचार और साहित्य एक दूसरे का पोषण करते हैं, वहीं विचारधारा उसे विष की तरह खोखला करती है.'
बात सही हो सकती है.
मेरी एक जिज्ञासा है. अगर विचार सही है तो विचारधारा क्यों नहीं? विचार छुट-पुट ढंग से सही हो सकते हैं, उनमे कोई आतंरिक संगति न हो तो वे सही हैं और अगर वे वृहद् परिप्रेक्ष्य को समझने में.... एक तार्किक संगति बनाये रखकर आगे बढ़ते हैं तो वे विष-तुल्य कैसे हो जाते हैं?
विचार सही है तो विचार-श्रृंखला कैसे गलत है?
मेरी समझ में विचार विचारधारा का सब-सेट है.
विचारधारा विरोध कहीं विचार का ही प्रच्छन्न-विरोध तो नहीं है?
व्यक्ति, समाज और राजनीति में सामान्यतः हर दौर में भले और बुरे तत्त्व मौजूद रहे हैं। लेकिन समाज की एक लगभग मान्य नैतिक संहिता भी हमेशा रही है, हालांकि वह ज़्यादातर हारती ही रही है। पर उस हार के समय भी एक नैतिक बोध ज़रूर बना रहता है।
वे दौर विकट होते हैं जब यह मान्य संहिता दम ही तोड़ दे और सारा अपशिष्ट (गंदगी) वैध बनकर सतह पर तैरने लगे।
एडवर्ड हर्मन और नॉम चोम्स्की ने एक पुस्तक लिखी है-Manufacturing Consent: The Political Economy of the Mass Media.
पुस्तक में चुनी हुई घटनाओं पर अमेरिकी मीडिया के आचरण ( मॉडस ऑपेरंडी ) की केस स्टडीज़ हैं।
पुस्तक इतने मूल्यवान निष्कर्ष निकालती है कि बहुत ज़रूरी क़िताबों में से एक बन जाती है।
निष्कर्षों को आप देखेंगे तो पायेंगे कि वे अमेरिकी मीडिया तक लागू नहीं होते बल्कि लगभग सार्वभौमिक हैं।
ज़रूरी क़िताब है।
पीडीएफ भी है।

सामान्य जन-मानस में एक लगभग स्वीकृत मान्यता है कि "कोई भी व्यक्ति तभी तक ईमानदार है जब तक कि उसे बेईमानी का अवसर न मिले" और इस तरह की मिलती जुलती अन्य बातें।
मनुष्य के बारे में ऐसा विचार, मेरी समझ में, ग़लत है और रुग्ण मनोवृत्ति का परिचायक है।
मनुष्य को इस तरह मानना अशुद्ध मान्यता है, ख़ुद का और दूसरों का अवमूल्यन है।
"A Dreary Story" (aka "A Boring Story")


चेख़व की यह बड़ी कहानी या लघु उपन्यास बेहद पसंद आया। उनकी वार्ड नं 6 की तरह ही यह कृति भी आपको अंत तक गहरे से जोड़ के रखती है।
हालांकि, मुझे वार्ड नं 6 ज़्यादा पसंद आयी थी। क्योंकि, वार्ड नं 6 अपने आशयों में ज़्यादा मुखर है।
मानवीय संबंधों, भावनाओं और विचारों पर चेख़व का बेहतरीन वक्तव्य इस कृति (A Dreary Story) में है और इतनी मोहक शैली में कि 60 पेज आप बिना पढ़े छोड़ नहीं सकते।
एक छोटा-सा हिस्सा देखिए:
"They say philosophers and the truly wise are indifferent.
It is false: indifference is the paralysis of the soul; it is premature death."
Tolstoy (While summarising his critique on Shakespeare's work)...



"The merit of every poetic work depends on three things:
(1) The subject of the work: the deeper the subject, i.e., the more important it is to the life of mankind, the higher is the work.
(2) The external beauty achieved by technical methods proper to the particular kind of art. Thus, in dramatic art, the technical method will be a true individuality of language, corresponding to the characters, a natural, and at the same time touching plot, a correct scenic rendering of the demonstration and development of emotion, and the feeling of measure in all that is represented.
(3) Sincerity, i.e., that the author should himself keenly feel what he expresses. Without this condition, there can be no work of art, as the essence of art consists in the contemplation of the work of art being infected with the author's feeling. If the author does not actually feel what he expresses, then the recipient can not become infected with the feeling of the author, does not experience any feeling, and the production can no longer be classified as a work of art.
Shakespeare's works do not satisfy the demands of all art, and, besides this, their tendency is of the lowest and most immoral. What then signifies the great fame these works have enjoyed for more than a hundred years?"

Yogendra Ahuja तोल्स्तोय शेक्सपियर की रचनाओं को सिर्फ़ नापसंद ही नहीं करते थे, उन्हें evil की संज्ञा से अभिहित करते थे I शेक्सपियर के नाटकों पर उनका लम्बा निबंध, उनके तर्कों से पूरी सहमति मुमकिन न होने के बावजूद, बहुत गहन और सशक्त (और रोचक ) है I

Mahesh Mishra पढ़ते समय पूरी सहमति नहीं बन पा रही थी मेरी भी। 

ऐसा लगता है थोड़ी-सी जलन है टॉलस्टॉय में।


पर जब वे शेक्सपियर की प्रसिद्धि के कारणों पर लिखते हैं तो काफी प्रामाणिक लगते हैं, जब वे उनके चरित्र और उसकी भाषा की असंगति रेखांकित करते हैं तो वे सही लगते हैं। जब वे उसके नैतिक पक्ष पर बात रखते हैं तो भी वे सही लगते हैं।

पर उनका ख़ुद का नैतिक प्रस्ताव उतना सही नहीं लगता (ईसाई नैतिकता)।

हां, मेरा अपना अनुभव शेक्सपियर के लेखन को लेकर कुछ वैसा ही रहा है। उनका लिखा कुछ भी बांध नहीं पाया आज तक!

कई बार कोशिश की। शेक्सपियर की तुलना में टॉलस्टॉय के चरित्रों का विकास बहुत स्वाभाविक और प्रामाणिक लगता है।

Humanizing (wo)man's sensibilities: Marx' idea of art
"The senses have their own history. Neither the object
of art nor the subject capable of aesthetic experience comes

of itself-these arise out of the process of man's creative
activity.
'Only music awakens the musical sensibility of
man . . . for the unmusical ear the most beautiful music
means nothing . . . and so the sensibilities of the social
man are different from those of the non-social man.
Only through the objective development of the richness of
human nature is the richness of subjective human sensibility-the
ear for music, the eye for beauty of form, in
short, sensibilities capable of human enjoyment, sensibilities
which manifest themselves as human powers-in part
evolved, in part created. . . . The objectification of human
nature both in theory and in practice was necessary, therefore both in order to humanize man's sensibility and to
create for all the richness of human and natural existence
a corresponding human sensibility.
The aesthetic impulse is not something biologically inherent, something preceding social development. It is a historical product, the result of a long series of material and intellectual production. 'The object of art,' wrote Marx. 'as well as any other product, creates an artistic and beauty-enjoying public. Production thus produces not only an object for the individual, but also an individual for the object."

2) "A world of uniform and independent atom-citizens
fears LIFE because any REAL motion, any manifestation of
living forces and interests, menaces its abstract EQUILIBRIUM."
(Emphasis mine )
From the book 'The philosophy of art of Karl Marx' by Mikhail Lifshitz
Aristotle: "The perfectly conditioned
has no need of action since it is itself the end." (From the same book)


                                                               संस्कृति और समाज



संस्कृति (साहित्य और अन्य कलाएं) और समाज के रिश्ते पर वाम ने गंभीर विमर्श किया है. हालाँकि, मार्क्स और वाम पर एक आरोप हमेशा लगता रहता है कि आर्थिक-सामाजिक पक्ष पर उनका जोर इतना ज़्यादा है कि वे व्यक्तिगत उद्यम/ प्रेरणा को कोई महत्त्व नहीं देते. कि सबकी समानता पर बल देने से कला और संस्कृति तो पंगु और एकरस हो जाएगी, कि कला राजनीतिक हो जाएगी तो व्यक्ति को उद्वेलित नहीं कर पाएगी, कि मनुष्य में केवल आर्थिक प्रेरणा नहीं काम कर रही होती है...आदि, आदि. और यह चूक बड़े-बड़े मान्य लेखक/कवि भी करते हुए दिखते हैं: कुंवर नारायण, निर्मल वर्मा को हाल ही में पढ़ा है. वाम-पक्ष का लेखन करने वाले भी कई लोगों ने कला को राजनीतिक नारे की तरह लिया, उसकी संश्लिष्टता को नहीं आत्मसात किया जिससे द्वितीयक/ तृतीयक दरज़े की कलाकृतियां सामने आयीं. और वे ढेर में हैं.
किन्तु, जिन्होंने मार्क्स को या वाम-विचार की पुस्तकों को ज़्यादा गंभीरता से देखा है उन्हें मार्क्स के छुटपुट विचारों से उनके विकसित सौंदर्य-चिंतन की झलक मिलती है.
मार्क्स के अनुसार, हमारी इन्द्रियां ही कला का आस्वाद लेती हैं, इन्द्रियां ही कला को सृजित करती हैं और यह इन्द्रियां सामाजिक पक्ष को/से एक्सपोज़ रहती हैं ऐसे में कला की पूर्णतः व्यक्तिवादी और रहस्यवादी अवधारणा त्रुटिपूर्ण है. हाँ, यह अलग बात है कि यह सम्बन्ध अंकगणितीय किस्म का नहीं होता है, इसमें व्यक्ति का अंतस भी शामिल होता है. व्यक्ति के अंतस की जटिलता और सामाजिक-सांस्कृतिक जटिलता और उनकी विरासत उसके अंदर सक्रिय रहती है.
उनके विचारों को क्रमबद्ध रूप से मिखाइल लिफ्सिटज ने पुस्तकाकार व्यवस्थित किया था. जिनकी इस विषय में रूचि है उनके लिए पुस्तक की लिंक दे रहे हैं. इस पुस्तक के अलावा इसी विषय पर प्लेखानोव ने 'कला का सामजिक उद्भव' नाम की पुस्तक लिखी है जिसमें बड़े ही प्रामाणिक ढंग से यह दर्शाया गया है कि कला का उद्भव सामाजिक है न कि किसी दैविक प्रेरणा या जन्मजात प्रतिभा का विस्फोट.

India Today चैनल पर 7:30 बजे से In Depth कार्यक्रम आ रहा है। आधे घंटे का है शायद।
in Depth नाम है। मुकेश अम्बानी के बेटे के इंगेजमेंट पर है यह प्रोग्राम!
किसने क्या पहना था है विषय-वस्तु!
भाषा के साथ ऐसे बर्ताव बड़े मौलिक हैं न!
In depth!
सॉरी सॉरी... प्रस्तोता ने कार्यक्रम के बीच में स्पष्ट किया... इंगेजमेंट नहीं, प्रि-इंगेजमेंट सेरेमनी थी।
जीवन के प्रति स्वस्थ दृष्टि क्या है, यह जापानी फिल्मकार ओज़ू से बेहतरीन कम लोग ही जानते हैं. उसे कलात्मक रूप से ढालने का कौशल और भी कम लोगों में है...और विश्वसनीय कला के रूप में तो और भी विरल है.
ओज़ू की यह फिल्म माँ-बेटे के रिश्ते पर है.
मूक-फिल्म वाक् से भी बेहतर हो सकती है, नहीं मानते तो धीरज से फिल्म 1934 A Mother Should be Loved को देखिये.
"Would it not be easier
In that case for the government
To dissolve the people
And elect another?"
ब्रेष्ट की कविता 'द सॉल्यूशन', 'समाधान' की यह अंतिम पंक्तियां हैं जिसमें सरकार अपने लिए नई जनता चुनने को समाधान मानती है!
संघ के मंत्री जयंत सिन्हा ने मॉब लिंचिंग के दोषियों (जी हाँ, आरोपियों को नहीं), दोषियों का माला पहनाकर स्वागत किया, सम्मानित किया।
अपनी पसंद की जनता चुन ली है!
और हां, त्रिपुरा के मुख्यमंत्री ने भीड़ द्वारा मॉब लिंचिंग जैसी अराजकता हाथ में लेने (कानून हाथ में लेने वाला मुहावरा मुझे अनुचित लगता है, वह सही अर्थ नहीं बताता) को बोला कि यह जनता की सरकार है, जनता ही चला रही है, वही फैसले कर रही है।
सरकार ने अपनी पसंद की जनता चुन ली!
ब्रेष्ट की कविताएं वैसे तो अपने अर्थ ज़ल्दी खोल देती हैं किंतु इस कविता का अर्थ मेरे लिए अब खुला है।
इस तरह से कौन-सी देशसेवा होती है!
बाक़ायदे डिज़ाइन बनाकर नफ़रत का माहौल बनाया जाता है।
जो इस डिज़ाइन को बनाते हैं और उसके प्रेरक, सेवक हैं, वे क्या उद्देश्य लेकर चल रहे हैं, क्या यह समझना मुश्किल है, मुझे तो नहीं लगता।
पूरा देश नफ़रत और डर की गिरफ़्त में आता जा रहा है इस डिज़ाइन से।
हमारे सामूहिक मनोविज्ञान के लिए यह बहुत बड़ी क्षति है और आसानी से यह दुरुस्त नहीं होगी।

https://www.altnews.in/hindu-khatre-mein-hai-how-the-fake-news-ecosystem-targets-minorities-to-create-a-fear-psychosis/