Monday, 16 July 2018

येसिजुरो ओज़ू का सिनेमा और मेरा जापान से प्रेम

येसिजुरो ओज़ू का सिनेमा और मेरा जापान से प्रेम शीर्षक आपको कुछ अजीब लग रहा होगा. पर मैं आपको एक निजी बात बताऊँ. जापान के बारे में जो भी जानकारी रही है मेरी वह है कि यह ऐसा देश है जहाँ तकनीक से बहुत प्रेम है, कि इस देश की तकनीक बहुत उन्नत है, कि यहाँ लोगों की उम्र काफी बढ़ गयी है, कि बूढ़े लोगों की ठीक से देखभाल नहीं हो पाती, कि यहाँ के लोग साफ़-सफाई बहुत पसंद करते हैं, कि जापानी लोग बहुत अनुशासित होते हैं, कि उनका देश-प्रेम बहुत श्रेष्ठ स्तर का है, इतना कि वे कुछ भी कर रहे हों, राष्ट्र-गान शुरू होते ही सब खड़े हो जाते हैं.


उनके राष्ट्र-प्रेम को लेकर एक मीठी-सी जलन तो हमेशा से महसूस होती रही है कि हमारे देश के लोग इस तरह से अपने देश को प्रेम क्यों नहीं करते! एक बचकानी-सी, उलाहना भरी आकांक्षा थी/ है शायद!


yasujiro ozu के लिए इमेज परिणाम
जापानी फिल्मकार यासिजुरो ओज़ू (साभार गूगल) 

मेरी यह जानकारी वहां के फिल्मकार ओज़ू की फिल्मों को देखने से पहले की हैं. नहीं कह सकता कि मेरी जानकारी में कोई उल्लेखनीय वृद्धि अभी भी हो पायी है क्या. लेकिन जापान को लेकर एक तरह का प्रेम विकसित हुआ, सिर्फ ओज़ू की फिल्मों को देखकर!




किसी कलाकार की कला क्या कर सकती है, मुझे कभी इतनी शिद्दत से महसूस नहीं हुयी, जितनी ओज़ू की फ़िल्में देखकर हुयी!





सबसे पहले उनकी बहुचर्चित टोकियो स्टोरी देखी। श्वेत-श्याम में, १९५३ की फ़िल्म। शुरुआत में लगा कि अरे यह कितना स्लो है. अरे कितने साधारण संवाद हैं. क्या इसमें उल्लेखनीय है भला?

साभार-गूगल
tokyo story ozu quote के लिए इमेज परिणाम
tokyo story ozu quote के लिए इमेज परिणाम
                     साभार-गूगल 












कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है तो बॉलीवुड की इसी थीम पर बनी फ़िल्म बागबाँ याद आने लगती है और जाने -अनजाने एक तुलना शुरू हो जाती है. 
baghban के लिए इमेज परिणाम
साभार-गूगल 
baghban के लिए इमेज परिणाम
साभार-गूगल 
  



माँ-बाप के लिए बच्चों का प्रेम/ देखभाल किस रूप में चल रहा है, इसमें आप शरीक़ हो जाते हैं. 

बागबाँ अपने निरूपण में कितनी शोरभरी और रूखी  है! इतनी लाउड है कि सच नहीं लगती।

 हिंदी-सिनेमा के दर्शक को शायद इसी रूप में देखा जाता है, इसी रूप में उसका दर्शक के रूप में विकास किया गया है!

 खैर, उन्ही बातों को लेकर टोकियो स्टोरी इतने शांत तरीके से आगे बढ़ती है कि दर्शक के रूप में आप उस कहानी को ज़्यादा लीं होकर देख पाते हैं. 

ओज़ू के निरूपण में आपको कटुता नहीं, बल्कि धीरज मिलेगा; ध्वंस करने वाली आलोचना नहीं, बल्कि आत्म को पोषित करने वाली दृष्टि मिलेगी, सच को विनम्रता से देख पाने का सलीका मिलेगा.

ओज़ू की फ़िल्म में हाथ से अखबार खींचने जैसे प्रकट अपमान की ज़रूरत नहीं पड़ती, या यूँ कहिये कि घटना को इतने अश्लील तरीक़े से नहीं दिखाते.
फ़िल्म बागबाँ का एक दृश्य जब बहू अख़बार छीनती है (साभार-यूट्यूब)


ओज़ू तो बेटी से अच्छी मिठाई अपने माता-पिता को देने की ज़रूरत नहीं है, इस भंगिमा से ही अपनी बात कह ले जाते हैं. बागबाँ में माँ-बाप यह कहते हैं कि बच्चों को उनकी फ़िक्र ही नहीं है, टोकियो स्टोरी में पिता साधारण देखभाल के प्रश्न पर कहता है 'हम बच्चों से बहुत ज़्यादा की उम्मीद नहीं कर सकते. उनका भी तो जीवन है.'

tokyo story के लिए इमेज परिणाम
टोकियो स्टोरी का एक दृश्य (साभार- गूगल) 


जब आप ओज़ू की अन्य फिल्में देखते हैं तो आपको इस व्यक्ति पर और ज़्यादा शृद्धा हो जाती है. 1949 की फ़िल्म लेट स्प्रिंग जिसमें बाप-बेटी के सम्बन्ध को कितनी आत्मीयता और प्यार से दिखाया है! आप मुग्ध हो जाते हैं. इस फ़िल्म में बेटी इसलिए शादी नहीं करना चाहती है कि पिता अकेले हो जाएंगे, उनकी देखभाल कौन करेगा..फिर किसी ने बेटी से बोला कि उसके पिता ख़ुद शादी करने वाले हैं तो वह इस बात से गुस्सा होती है कि माँ को कैसे भुला सकते हैं और अपने पिता से रूखेपन से पेश आने लगती है. चूंकि पिता को तो यह पता नहीं है वे वैसी ही कोमलता से बेटी से पेश आते रहते हैं. बेटी को शादी के लिए तैयार करते हुए बड़ा ही सुंदर वार्तालाप होता है. 

Image may contain: 1 person, smiling, text
फिल्म लेट स्प्रिंग का एक दृश्य (साभार-गूगल)

"बेटी: पापा, मैं आपके साथ ही रहना चाहती हूँ. मैं कहीं नहीं जाना चाहती हूँ. मैं केवल आपके साथ रहना चाहती हूँ. मैं बिलकुल ख़ुश हूँ. शादी भी मुझे इससे ज़्यादा ख़ुश नहीं कर सकती. मैं पर्याप्त ख़ुश हूँ. 


पिता: हाँ, लेकिन...

बेटी: न, न. आपको शादी करनी है तो कर लीजिये. मैं तो केवल आपके पास रहना चाहती हूँ. मैं आपको बहुत ज़्यादा  पसंद करती हूँ. 


मेरी सबसे बड़ी ख़ुशी आपके साथ रहने में है. 

मुझे पता है कि शादी से मैं अभी से ज़्यादा खुश नहीं हो पाऊंगी.

पिता: नहीं, यह सही नहीं है. देखो, मैं अभी 56 वर्ष का हो गया हूँ और मेरा अंत निकट ही है. नए जीवन के लिए 
तुम्हारा तो अभी पहला कदम है. जीवन जो तुम और सरकाटे (भावी पति) मिलकर संवारोगे. 

केवल पापा के साथ ही बने रहना है!

दुनिया मेरे अलावा भी है.  इंसान का जीवन 
ऐसे ही है और ऐसे ही सभ्यता आगे बढ़ती रही है.

हो सकता है कि शादी शुरुआत से ही ख़ुशी न दे पाए, किन्तु सबको आगे बढ़कर इस ख़ुशी का इंतज़ार करना चाहिए.

सच्ची ख़ुशी कभी भी दी हुयी नहीं होती। इसके लिए तो काम करना पड़ता है. शादी ख़ुशी नहीं। यह तो मिल-जुलकर नया जीवन बुनना है, और यही ख़ुशी है. इसमें एक साल भी लग सकता है, कई भी लग सकते हैं. कभी-कभी तो 5 से 10 साल भी लग जाते हैं.

ख़ुशी तो कोशिश करने पर ही आती है. और तभी तुम पति-पत्नि होने का सच्चा दावा कर सकते हो.

.. 


..

अभी तक जितना प्रेम मुझे किया है वह सबका-सब सरकाटे को मिलना चाहिए.
और इससे ही सच्ची ख़ुशी आएगी."



(बेटी शादी के लिए तैयार हो जाती है.)

(फ़िल्म के इस अंश के वार्तालाप का मेरे द्वारा किया गया अनुवाद).






Sunday, 8 July 2018

कॉमिक विडंबना
जिन लोगों का मूर्तियों में यकीं नहीं वे तोड़ने का विरोध कर रहे हैं और जिन्हे प्रतिनायक और खलनायक की भी मूर्तियों को बनाने और पूजने का शौक है वे नायकों की मूर्तियां तोड़ रहे हैं.


यह उस सन्दर्भ में है जब भाजपा की सरकार त्रिपुरा में बनने के बाद बुलडोज़र से लेनिन की मूर्ति ढहायी गयी थी.

मूर्तियों को लेकर मेरे मन में काफी समय से एक नाज़ुक-सा तिरस्कार है. यह मैं निश्चित रूप से नहीं कह सकता कि मूर्तियों का होना, उनका पूजा जाना, उनमें अपनी शृद्धा टिकाना कितना ज़रूरी या गैर-ज़रूरी है.

हमारे अपने देश का अनुभव तो यही बताता है कि इसके नुक्सान ही ज़्यादा हैं, फायदे कम.

बुद्ध और महावीर ने इसका विरोध किया अब उनके अनुयायी भी उनको idolize करके पूजते हैं, उनके विचारों से उतनी प्रेरणा नहीं लेते हुए लगते हैं. ऐसे ही गांधी जी को, आंबेडकर जी को हमने पढ़ने और ठीक से मानने के बजाय पूजना शुरू कर दिया.     
आखिर हमारी सभ्यता ने सत्य, न्याय और समानता पर कितना विचार किया?


सभ्यता के रूप में हम भारतीय बहुत पुराने हैं. संस्कृति और सभ्यता का इतिहास पुराना है. दर्शन, साहित्य, वास्तु, कीमियागरी और आयुर्विज्ञान की हमारी बड़ी ही समृद्धिशाली और दुनिया की अन्य सभ्यताओं से तुलनीय विरासत है.


लेकिन, मुझे सच में यह नहीं पता कि न्याय और समानता जैसे सार्वजनीन मानवीय मूल्यों पर वेद, उपनिषद और पुराणों में क्या है?

उदाहरण के लिए, क्या कहीं सच के स्वरुप को समझने की कोशिश है? क्या लौकिक मायनों में शास्त्रीय ढंग से कोई विचार हुआ है?

न्याय के बारे में क्या सोचा था हमारे मनीषियों ने?


बंधुता, और स्वतंत्रता अपेक्षाकृत नए मूल्य हैं, इसलिए इस पर उतनी चर्चा इन ग्रंथों में शायद न हुयी हो?


चूँकि एथेंस में सुकरात उपनिषद काल के भारत के समय ही सत्य, न्याय आदि अवधारणाओं पर द्वंद्वात्मक ढंग से विचार कर रहे थे. प्रामाणिक रूप से खंडन मंडन कर रहे थे. सुकरात की पूरी शैली इस बात का प्रमाण है कि वे सत्य के किसी स्थिर स्वरुप को मानने को तैयार नहीं थे. वे हर तरह के सत्य-कथन आदि की परीक्षा करते थे और लोगों का आह्वान करते थे कि वे भी वैसा ही करें. 


इस तरह के प्रयास हमारे देश में कितने हुए, यह जानने का मन करता है. 


जितना भारतीय दर्शन मैंने पढ़ा है उसमें आध्यात्मिक पक्ष पर ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर दिखता है. सत्य, न्याय आदि की स्थिर धारणाओं, उनके पारलौकिक अर्थों पर बलाघात स्पष्ट है. 
मुहावरा-निर्मित समझ?


मुझे लगता है कि हमारी चेतना का, या यूं कहिये कि सामान्य समझ का बड़ा हिस्सा उक्ति/ सूक्ति-कथनों, मुहावरों, चुटकुलों से निर्मित है।


मुहावरे, कथन आदि संचित ज्ञान के हिस्से होते हैं और कई बार वे समय की परीक्षा में खरे भी उतरते हैं। लेकिन उनका यथार्थ से संबंध कभी-कभी बड़ा उथला और सामान्यीकृत किस्म का होता है जो नयी परिस्थितियों में लागू होते समय कई बार उथली समझ और उथले निर्णयों का कारण भी बनता है.


 लेकिन, चूंकि ये कथन-मुहावरे-उक्तियाँ सामान्य बोध का हिस्सा होती हैं और इस नाते यथार्थ के साथ उथला/ उल्टा सम्बन्ध भी बड़ा स्वाभाविक सा और वैध लगता है।


मुझे लगता है कि यह नयी परिस्थितियों की समझ और उनके सही विश्लेषण को बाधित करता है। इसलिये इनका समय-समय पर परीक्षण करते रहना चाहिए, इनकी सीमायें उद्घाटित करते रहना  विशिष्ट महत्त्व का मानना चाहिए।
संवेदनशील व जिम्मेदार लोग अपने समय की कुरूपताओं के क्रिटीक होते हैं। (सामान्य क्रिया कलापों के समर्थन की ज़रूरत नहीं होती है, क्योंकि वह तो अपेक्षित ही होता है।)
उनका क्रिटीक शब्दों में व्यक्त हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है, उनके कर्मों में ज़रूर होता है।
मसलन, एक सांविधानिक व्यवस्था के नागरिक/ग्रामीण और कार्मिक की निष्ठा संविधान के आधारभूत मूल्यों की रक्षा में देखी जा सकती है। (जैसे अपने देश के संदर्भ में-न्याय, स्वतंत्रता, समानता, कमजोरों का, ख़ासकर कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति का संरक्षण, कानून का शासन इत्यादि।)
इन मूल्यों से बढ़कर उसके लिए कुछ नहीं होना चाहिए। इन मूल्यों की रक्षा ही एक व्यक्ति की, संस्था की कसौटी होने चाहिए।
इन प्रतिबद्धताओं से खुद को भी जांचना चाहिए, अपने संगी-साथियों को भी और अपने संस्थानों को भी।
क्या इस मानक को लेकर भी दो-राय हो सकती है??
सूचना के माध्यम यदि सच्चे, ईमानदार और संवेदनशील नहीं हैं, यदि वे जिम्मेदार नागरिक-समाज के गठन में अपनी भूमिका नहीं समझते हैं तो उनका बहिष्कार करना चाहिए।
उदाहरण के लिए, दैनिक ...गरल. मैंने तो कभी पसंद नहीं किया, लेकिन इस व्यक्तिगत बहिष्कार से जरूरी है: घोषित बहिष्कार।
मुझे लगता है कि alt news जैसे प्लेटफॉर्म, जो समाज में झूठ फैलाने वालों को बेनकाब करते हैं, को वह पैसे देने चाहिए बजाय कि कूड़ा-करकट पढ़ने-देखने में जाया करने और बदले में मन में जहर भरने के।
Babam.ve.Oglum तुर्की भाषा की इतनी प्यारी-परिपक्व फ़िल्म है कि इसे बार-बार देखते हैं, बार-बार पसंद आती है, हर बार आँखें भीगती हैं और हमेशा सराहते हैं।
पिता-पुत्र संबंध पर तो इतनी सुंदर शायद ही कोई फ़िल्म हो!
गहरे अर्थों में मनोवैज्ञानिक... अपने देश की तरह का सामाजिक ताना-बाना...प्यारे-से रिश्ते...बचपन की आँखों से दुनिया... मां की आंख से बेटा और पोता....बेटे से नाराज व्यक्ति को पोते के माध्यम से पिघलाना/पिघलना... बहन-बहन का रिश्ता... भाई-भाई का रिश्ता...सब कुछ इतने विश्वसनीय तरीके से, इतनी कोमलता से दर्शाया है कि अगर एक सम्पूर्ण फ़िल्म का नाम पूछा जाय तो इसी का नाम लेंगे हम।
अगर फ़िल्म को एक माध्यम के रूप में सराहते हैं तो इसे ज़रूर देखिये।
कभी न भूलने वाला अनुभव मिलेगा।
व्यक्ति के रूप में आप थोड़े समृद्ध भी होंगे।