विचारणीय यह नहीं कि लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में किसी की स्वीकृति कितनी है...विचारणीय तो यह बात है कि उस स्वीकृति के संदर्भ क्या हैं...उसका प्राण-रस कहाँ से आ रहा है...वह जनाकांक्षा का कितनी प्रामाणिकता से प्रतिनिधित्व कर रहा है? जनाकांक्षा क्या अपनी वास्तविक मंशा को अभिव्यक्त करने के मौके पा रही है? कहीं जनता भी तो नहीं खंडित विकास की अवधारणा को सच मानकर बैठ गयी है? क्या जनता वृहद मानवीय सन्दर्भों को समझने और उसके अनुरूप लोकतांत्रिक आचरण कर पाने में सफल हो पा रही है या कुशल योजनाकारों की रणनीतियों के कुहासे में भटक गयी है? राजनीतिक प्रक्रिया क्या मतदाता को शिक्षित कर पा रही है? मत बनाने का कार्य मीडिया करता है तो वह कितनी प्रामाणिकता से छवियों का निर्माण कर रहा है? मीडिया अपने दैनिक दायित्वों(!) की ओट में कहीं लोकतांत्रिक प्रक्रिया के दीर्घकालिक लक्ष्यों से भटक तो नहीं गया? उसके कोई दीर्घकालिक, सकारात्मक लक्ष्य हैं भी या नहीं? हैं तो वे कितने जनपक्षधर हैं? मैं इस बात में यकीन नहीं कर सकता कि 'जीत सच्चाई और नेकी की होती है'...जीत के आधार परसेप्शन में होते हैं और परसेप्शन सच के आधार पर भी बनते हैं और झूठ के कुशलतापूर्वक इस्तेमाल पर भी...इसके ढेरों उदाहरण इतिहास से लेकर वर्तमान तक हैं.
अब ये अलग बात है कि एक बात को मापने के ठोस सांख्यिकीय पैमाने हैं और दूसरी बात के केवल आनुभविक. सांख्यिकीय पैमानों से कथन प्रामाणिक बनते हैं, आनुभविक बातों से नहीं...पर यदि अनुभवों में प्रामाणिकता है तो दीर्घकाल में उनका सांख्यिकीय मापन भी होता है...और हकीकत आज आप पहले के सांख्यिकीय दावों की उपलब्धि की सच्चाई के आधार पर कर सकते हैं.
अब ये अलग बात है कि एक बात को मापने के ठोस सांख्यिकीय पैमाने हैं और दूसरी बात के केवल आनुभविक. सांख्यिकीय पैमानों से कथन प्रामाणिक बनते हैं, आनुभविक बातों से नहीं...पर यदि अनुभवों में प्रामाणिकता है तो दीर्घकाल में उनका सांख्यिकीय मापन भी होता है...और हकीकत आज आप पहले के सांख्यिकीय दावों की उपलब्धि की सच्चाई के आधार पर कर सकते हैं.
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