अन्य हर काम की तरह मैं ब्लॉग पर भी अनियमित ही रह रहा हूँ. कारण पता नहीं क्या है...एक अजीब सी निराशा क्यों रहती है...पूरा तंत्र जैसे खून चूस रहा हो...प्रत्यक्षतः मेरे जीवन में ऐसा कुछ भी नहीं जो शोषण जैसी स्थिति की तरफ इशारा करे...पर जब हमारे देश में और विश्व में इतने संसाधन हों कि किसी की भी प्राथमिक जरूरतें पूरी होने में कोई बाधा न हो सिर्फ लोभ, लालच और तंत्र की विसंगतियाँ लोगों का जीना हराम कर रही हों तब खा पी के आराम से रहना, मस्ती से सोना संभव नहीं दीखता. ब्रेष्ट की एक कविता याद आ रही है...
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