आज एक नए स्वामी श्री श्री १००८ कुमारस्वामी के बारे में पता चला. ये स्वामी जी बीज-मन्त्र देते हैं और किसी भी समस्या का समाधान कर सकते हैं...यहाँ तक कि गर्भस्थ शिशु को राष्ट्रपति भी बनाने का दावा करते हैं. बीच में एक ईसाई संत पाल दिनाकरन के बारे में पता चला...रोज ही एक नए बाबा का आविर्भाव. क्या है ये? इस सन्दर्भ में मैंने एक लेख दो माह पहले लिखा था जिसमे मैंने यह प्रस्थापना दी थी कि बाबाओं का आगमन एक प्रवृत्ति है न कि छुटपुट बाबाओं का खेल. यह अन्धविश्वास मात्र नहीं है.
निर्मल बाबा व्यक्ति या प्रवृत्ति
निर्मल बाबा कौन हैं? निर्मलजीत सिंह नरूला
नाम का सख्श जो भट्ठे और कपड़े के व्यवसाय में तो नहीं सफल हुआ पर आस्था के कारोबार
का नया सेलेब्रिटी बन गया है...आखिर सबसे सरल व्यवसाय जो ठहरा! पर समझने की बात यह
है कि क्या निर्मल बाबा इस धंधे में सिर्फ एक नया नाम भर है? क्या इनमे और अन्य
बाबाओं में कोई भिन्नता है? क्या उन पर ईश्वर(!) की वाकई कोई ‘किरपा’ है? नहीं. निर्मल बाबा
सिर्फ एक नया नाम भर नहीं है. वह एक विकसित होती प्रवृत्ति का उन्नततर अगला चरण है.
वह लगातार फलती फूलती सभ्यता और संस्कृति का एक नया रूपक है.
यह एक वैज्ञानिक
तथ्य है कि जिस स्थान में ठोस या तरल पदार्थ नहीं होता या हटा लिया
जाता है, वह गैसीय माध्यम द्वारा घेर लिया जाता है. यहाँ पर हमें एक
अद्भुत साम्य दिखता है. लोगों की भौतिक आवश्यकताएं पूरी नहीं हो पायीं, उनमें वैज्ञानिक अभिवृत्ति
का विकास नहीं हो पाया...तो इस रिक्त स्थान (भौतिक और मनोवैज्ञानिक दोनों), को रुढिवादिता और अलौकिकता
की बढती प्रवृत्ति ने ले लिया...बिलकुल प्रकृति विज्ञानों का अनुसरण हुआ! मानव समाज
में विकास मानवीय विज्ञानों की भांति होता तो अधिक अच्छा होता न?
आइये समझते हैं कि आस्था के नए विपणन केंद्र आखिर अपने लिए
पहले से संतृप्त बाजार में जगह कैसे बनाते हैं? इसके लिए हमें एक दूसरा
साम्य याद आता है...उपभोक्ता वस्तुओं में से जब किसी नए ब्रांड का प्रोडक्ट लॉन्च किया
जाता है तो उसकी बिक्री के लिए विपणन प्रबंधक विज्ञापन ऐसे ढंग से बनवाते हैं जिससे
वह बिलकुल नयी आवश्यकता को पूरी करनेवाली लगे. इसके लिए आप साबुन या कोल्ड ड्रिंक या
कोई भी अन्य विज्ञापन देख सकते हैं...हमारे बाबा, बापू और स्वामी भी
यही करते हैं...निर्मल बाबा सारे धर्मों, सारी आस्थाओं के लोगों के लिए समागम खुला रखते हैं, तीसरी आँख से देखते
हैं और ‘किरपा’ करते हैं. किरपा और आशीर्वाद की बारिश होती है यहाँ, सारे कष्ट मिट जाते
हैं. यदि आपकी नौकरी नहीं लग रही-निर्मल बाबा की कृपा से लग जायेगी, अगर आप बीमार हैं और
सारे एमबीबीएस, एमएस, एमडी और दूसरी विधाओं के सारे डाक्टर फेल हो चुके हों-तो
बाबा के निर्मल दरबार में अर्जी लगाने से वो ठीक हो जाएगा, शादी नहीं हो रही तो, हो बाबा के समागम टीवी
चैनेल पर प्रसारित होते हैं...क्या भक्ति चैनेल, क्या मनोरंजन चैनेल
और क्या समाचार चैनेल...बाबा ईश्वर(!) की तरह ही सर्वव्यापी हो चुके हैं.
समाचार चैनेलों की वह परमपावन स्वनियामक व्यवस्था क्या यही
है? क्या यह भारत की प्रसारण
संहिता और संविधान के संगत है? न्यूज़ ब्रोडकास्टर असोसिएशन का क्या काम है? प्रसारण सामग्री शिकायत
परिषद के क्या मायने हैं? भारतीय प्रसारण संघ की क्या भूमिका है?
जाहिर है प्रसारण संहिता यह नहीं कहती. और स्वनियामक व्यवस्था
में जीवद्रव्य ही नहीं. चैनेल्स अपने लाभ में लगे हैं. खुद निर्मल बाबा ने ‘आज तक’
समाचार चैनेल के साक्षात्कार में यह बात कही कि वे टीवी चैनेलों को पैसे देते हैं और
प्रसारण अधिकार हासिल करते हैं. टीवी चैनेल किसी घटना के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देते
हैं-मल्टीप्लायर एफेक्ट के अपने अन्तर्निहित गुण के कारण. यह मल्टीप्लायर एफेक्ट व्यवसाय
और मार्केटिंग का मूल है.
१३ अप्रैल को शाम के समय चैनेल्स में आलोचना का प्रयास दिखा.
इसलिए नहीं कि वे सत्य के मसीहा हैं बल्कि इसलिये कि उन्हें पता है कब टीआरपी कैसे
मिलेगी. बिलकुल अन्ना हजारे के आन्दोलन की तरह जब उन्हें आन्दोलन को महिमामंडित करने
से टीआरपी मिली तो वो किया, जब बहस से मिल रही थी, बहस करा दी. सबका व्यवसाय
खरा चल रहा...’दैहिक दैविक भौतिक तापा; राम राज काहुहिं नहि ब्यापा’. पर यह राम-राज्य सीमित विस्तार
में ही है. समाज का हर सदस्य इस ‘दैवीय’ समाज का सदस्य नहीं बन पाता. अर्थात कोई घाटे
में है तो वह है समाज का वृहद भाग.
विडम्बना यह है कि किसी भी अमानवीय व्यवस्था का विरोध करने
चलिए तो बहुप्रचलित तर्क सामने आते हैं...’लोग चाहते हैं तभी तो यह सब चल रहा है’...’लोगों
की आस्था का प्रश्न है’...’आप कौन होते हैं किसी को यह बताने वाले कि क्या होना चाहिये
और क्या नहीं’...आदि-आदि. पर क्या सब कुछ वाकई सही है? क्या जिनकी आवाज है
उनके तर्क ही मान्य किये जायें? क्या एक अधिक मानवीय, अधिक सभ्य व्यवस्था
की मांग करना अस्वाभाविक और अतार्किक है? हमें लगता है यह मांग होनी ही चाहिए. आवाज क्षीण भले ही हो
पर उठानी जरूरी है, शक्ति कम ही सही पर उसकी उपस्थिति आवश्यक है.
पुनः यह जानी पहचानी बात है कि झूठ को विश्वसनीय बनाने के
लिए उसका सच के साथ एक व्यावहारिक मिश्रण बनाना पड़ता है, चैनेल्स इसी तर्ज पर
व्यवसाय करते हैं और आस्था के ये दूकानदार भी...और तो और धर्म स्वयं भी सामजिक सरोकारों
की प्रक्षन्नता में बहुधा समाज के लिए ठीक यही काम करता है. धर्म अपने मौलिक स्वभाव
में एक स्थिर रहने वाली व्यवस्था है. यह समाज में श्रेणीकरण को न सिर्फ मान्यता देता
है बल्कि दैवीय तत्व के दावे के साथ मिलाकर उसे अनुलन्घनीय बना देता है. मानव वास्तविक
लौकिक विकास की जगह अलौकिकता की अँधेरी गुफाओं में उन्हें धकेलकर दिव्यता का जश्न मनाता
है, अपने लिए मूढ़ अनुयायी
बनाये रखना क्या उसके स्वयं के अस्तित्व के लिये जरूरी नहीं? धर्म यह काम स्पष्ट
यथार्थ और पारदर्शी रूप में तो कर नहीं सकता इसलिए वह सामजिक सरोकारों की आड़ लेता है.
इन प्रक्षन्न सामजिक सरोकारों की आड़ में जनता ठगी जाती रही
है. यहाँ पर जनता का तात्पर्य सिर्फ गरीब जनता ही नहीं और ठगे जाने का मतलब मात्र आर्थिक
दान-दक्षिणा ही नहीं है. जनता में वे भी हैं जो या तो अज्ञात के भय में रहते हैं, या बुरे कर्मों में
लिप्त हैं और पाप-प्रक्षालन के लिए धर्म/ईश्वर/बाबा का संरक्षण चाहते हैं, या अपने वर्गीय विशेषाधिकार
को अक्षुण्ण बनाये रखना चाहते हैं, या तार्किकता उनके लिए अधिक वांछनीय मूल्य नहीं है, या जिन्होंने धर्म
की उस आभासी तार्किक (वास्तव में कुतार्किक) बात कि ‘ईश्वर/धर्म आस्था की विषयवस्तु
हैं न कि तर्क की’, को शिरोधार्य कर लिया है.
जहाँ तक गरीब/वंचित समूह की इन आस्थाओं की बात है-वहाँ तो
वस्तुस्थिति ही ऐसी होती है कि वे अपने भाग्य को अपने हाथों बनता/बिगड़ता देख/समझ ही
नहीं पाते. व्यवस्था उन्हें कठपुतली की तरह नचाती है. और वे नाचते हैं. बीमारी/ नौकरी
की खोज में जो घोर सापेक्षिक अभाव है, जो मांग और पूर्ति का बेहद असंतुलन है उसे समझना, हल करना...उन्हें स्वयं
से तो असंभव ही लगता है, ऎसी स्थिति में क्या कर सकते हैं? वे अपने आप को प्रक्षिप्त
कर देते हैं-अपने से उच्चतर दिखती सत्ता के हाथों...धर्म तथा बाबाओं/स्वामियों की शरण
में. जो इस अवस्था के दोहन (मौद्रिक और भावनात्मक) के लिए पहले से बैठे होते हैं. व्यक्ति
को अपने भविष्य और वर्तमान का दायित्व स्वयं वहन करना असुरक्षित लगता है. किसी अलौकिक
शक्ति को समर्पित करने से तनाव का तिरोहन तो होता ही है, पलायन का अवसर भी मिल
जाता है और यह उनकी मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक जरुरत है. आस्था के लिए यह आदर्श स्थिति
है. है न?
तो क्या निर्मल बाबा के नाम से जो प्रवृत्ति या प्रक्रिया
हमारे सामने आई है, वह सरलता से समाप्त होने वाली है? नहीं. वजहें कई हैं.
और लक्ष्य बहुत मुश्किल. पहली तो भौतिक परिस्थितियों में मानवीय बदलाव आने चाहिये.
आपेक्षिक वंचना न तो वंचित वर्ग के लिए अच्छी है न ही प्रभु वर्ग के लिए. मानवीय गरिमा
की समान उदात्त भावनाएं दोनों में मौजूद हैं, आवश्यकता है तो उसे
उभारे जाने की, विकसित करने की. यह जटिल कार्य है और बहुविध प्रयास की मांग
करता है-दोषरहित लौकिक मूल्यों पर आधारित शिक्षा व्यवस्था, समाज के ध्येयों के
अनुरूप आर्थिक-सामजिक-सांस्कृतिक परिवेश का सृजन आदि. यह उच्च और अधिक मानवीय वातावरण
एक वृहद सामाजिक दृष्टिकोण से ही निर्मित हो सकता है न कि परमाणु की भांति मनुष्य को
स्वतंत्र कण मानने से. दूसरी बात वैज्ञानिक और तार्किक दृष्टिकोण के समुचित विकास के
बिना पारलौकिकता और चमत्कारों से हम मुक्त नहीं हो पाएंगे. तीसरी बात धर्म की सार्वजनिक
उपस्थिति तो कम से कम खत्म ही करनी पड़ेगी, बल्कि निजी जीवन में
भी धर्म की भूमिका सीमित करनी होगी. प्रश्न उठता है कि निजी जीवन से क्यों? क्योंकि ‘व्यक्तिगत
ही सार्वजनिक है’ अर्थात निजी और सार्वजनिक व्यवहार में पृथकता संभव ही नहीं. यह आप
किसी भी सार्वजनिक व्यक्तित्व के आचरण से सरलता से प्रमाणित कर सकते हैं. यह हमारे
सार्वजनिक जीवन में धर्मनिरपेक्षता के विकास के लिए भी महत्वपूर्ण होगा. जब हमारा जीवन
लौकिक दृष्टिकोण से संचालित होगा तो हमारे कृतिम भेद मिटेंगे, नागरिकता की समान भावना
से संचालित होकर हम अपने गणतंत्र के मान्य आदर्शों की तरफ बढ़ पाएंगे और एक स्वस्थ नागरिक
समाज निर्मित कर पायेंगे.
-महेश
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