Saturday, 23 June 2012

प्रेमचंद के साहित्य को समझने की कोशिश.


प्रेमचंद के साहित्य को समझने की मेरी कोशिश एक अतिसामान्य पाठक की कोशिश समझी जानी चाहिए. मैंने उनके उपन्यास-गोदान, सेवासदन, निर्मला, रंगभूमि पढ़ा और अनेक कहानियां पढ़ीं, साहित्य का श्रेय-प्रेय सम्बन्धी उनका वक्तव्य पढ़ा, उनके साहित्य के बारे में अनेक परवर्ती लेखकों के विचार जाने. और इन्ही सब से मेरी समझ उनके बारे में बनी.
मेरी समझ में प्रेमचंद जी एक बेहतरीन कथाकार हैं. खासकर ग्रामीण सामंती समाज, परिवार की जो उनकी कथाएं हैं वे पोर्ट्रेट लगती हैं. अगर आप वैसे समाज के हिस्से रहे हैं तो आप को साफ़ दिखेगा कि वो एक वृत्त-चित्र बना रहे हैं...न सिर्फ यह यथा-तथ्य का चित्रण होगा बल्कि उस जीवन का जो खोखलापन होगा उसको भी  बड़ी ही सरलता से आप को बता देंगे. एक अच्छे जीवन का संकेत सूत्र भी होगा उसमे. ईदगाह कहानी का हामिद हमारे परिष्कार में कितना उपयोगी हुआ है इसका कोई माप नहीं हो सकता, बच्चे हामिद का अभाव उसमे कमजोरी नहीं लाता वरन अभाव को भी अपनी प्रत्युत्पन्नमति से उसे अवसर में बदलने की उसकी सफलता साथ में ही मानवीय प्रेम का गहन क्षण हमें उन्नत करता है. बूढी-काकी नामक कहानी मेरी प्रिय कहानियों में से है. इस कहानी में भूख का जो जीवंत चित्रण है वह पाठक के सारे अस्तित्व को रोने पर बाध्य कर देता है. अमानवीयता से बचने का सशक्त सांवेगिक-प्रभाव छोडती है ये कहानी. एक कहानी जिसकी चर्चा कम होती है वह है-गुल्ली-डंडा. दो मित्रों की यह कहानी अत्यंत सफल मनोवैज्ञानिक कहानी है. सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण मित्रों में जो दूरी आ जाती है उसका प्रतिफलन रिश्तों में कैसे होता है इसका बेहतरीन उदाहरण है.
उनकी बहुप्रशंसित कहानियों कफ़न, पूस की रात आदि का तो कहना ही क्या? कफ़न में समाज के ढोंग को कितना सहज ढंग से संप्रेषित किया है यह उसे एक विशिष्ट कहानी बनाता है.भूख कितना बड़ा संवेग है इसको वही समझ सकते हैं जो इसे भोगते हैं. भोक्ता के अलावा इसे यदि कोई थोडा-बहुत समझ सकता है तो-वह एक सशक्त कलाकृति ही हो सकती है... प्रेमचंद की कहानी हो सकती  है, किसी चित्रकार का चित्र हो सकता है या एक फिल्म हो सकती है.
रंगभूमि नामक उनका उपन्यास एक कृति की दृष्टि से अत्यंत श्रेष्ठ लगती है मुझे. सूरदास के उदात्त चरित्र को बहुत अच्छे से सिरजा है प्रेमचंद जी ने. अहिंसात्मक आंदोलन की परिस्थिति-जन्य अपरिहार्यता का सहज चित्रण हो जाता है इस रचना में. ब्रितानी समाज का, भारतीय समाज के तत्कालीन अभिजात वर्ग का भी बड़ा प्रामाणिक चित्रण हो जाता है. हालाँकि अहिंसात्मक आंदोलन की जो सीमाएं हैं वो ही इस कृति की सीमायें भी बन जाता है.
गोदान उनका बेहतरीन उपन्यास है. कुछ साहित्यकार उसे अर्ध-उपन्यास, दो-उपन्यास मानते हैं. पर हमें तो  यथार्थ का एक बड़ा वितान रचने वाला यह उपन्यास एक सशक्त महागाथा ही लगता है. जैसे यथार्थ में सीमा-रेखा खींचना संभव नहीं वैसे ही एक अच्छी कृति में भी यह मुमकिन नहीं. धर्म के शोषक रूप का जो सहज, निरावृत चित्रण प्रेमचंद जी ने इस कृति में किया है वह दुर्लभ है...वह दुर्लभ इसलिए है कि रचना पाठक से यह कहलाने में सफल हो जाती है कि 'अरे धर्म लोगों को त्राण से छुटकारा दिलाने के लिए है या स्वयं शोषण का उपकरण'. एक निबंध यह काम नहीं कर सकता क्योंकि उसमे वह प्रभावोत्पादकता नहीं होती, वह पाठक को वैसे झंकृत नहीं कर सकता जैस एक जीवन-वृत्त.
कुल मिलाकर प्रेमचंद जी का साहित्य एक बेहतरीन मानव,  बेहतरीन समाज बनाने में बहुत कीमती भूमिका अदा करता है. जिसे भी ग्रामीण समाज की समझ बढानी है...हिंदी पट्टी के भारत को समझना है..एक बेहतरीन इंसान बनना है उसे प्रेमचंद साहित्य का अनुशीलन अवश्य करना चाहिए.

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