एक साक्षात्कार के दौरान हमसे पूछा गया कि
'आपने अपनी हॉबी में बच्चों से बात करना बताया है तो यह बताइए कि उनसे कैसी बातें करते हैं? हमने बोला कि बच्चों की बाल-सुलभ जिज्ञासा शांत करना अच्छा लगता है.'
समिति के अध्यक्ष ने पूछा कि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक कविता है जिसमें छः साल की बच्ची चन्दा मामा से पूछ रही है-
'कि कभी आप बड़े हो जाते हो कभी छोटे हो जाते हो, ऐसा क्यों करते हो?'
'अगर यह सवाल आपसे किया जाता तो आप क्या जवाब देते और हाँ, साइंस नहीं आएगी बीच में, प्लीज़।'
हम सही जवाब नहीं दे पाये थे क्योंकि हम विज्ञान के अलावा समझने का कोई तरीका आत्मसात ही नहीं कर पाये थे (वैसे यहाँ हैं भी लागू है, पता है क्यों?).
कल बिजली न होने की वजह से हम लोग छत पर थे. आंधी, तूफ़ान और बारिश की वजह से बिजली कटी हुयी थी. अब हालाँकि बारिश नहीं हो रही थी, आंधी भी बंद थी. मीठी-मीठी सी हवा चल रही थी, छितरे सफ़ेद-स्याह बादल थे आसमान में. चन्द्रमा सप्तमी-अष्टमी का रहा होगा। बहुत ही मोहक वातावरण था.
दो वर्ष नौ माह की बिटिया आद्या छत पर थी. बादलों की वजह से ढक जा रहे चन्द्रमा को देखकर उसने पूछा-
'पापा चन्दा मामा बंद होने जा रहे हैं?' 'सोने जा रहे हैं?
हमने फिर अपने 'विद्वता' का परिचय देते हुए समझाया कि नहीं घर नहीं जा रहे उनके सामने बादल आ रहे हैं इससे वो ढक रहे हैं. अभी फिर से खुल जाएंगे। फिर सार्थक को खुद से ढक के दिखाया और समझाने की कोशिश की ' कि जब सामने कोई चीज आ जाती है तो पीछे वाली चीज ढक जाती है'.
आद्या ने सुन तो लिया लेकिन हमारे उत्तर को बेजान समझकर उसने उत्तर दिया कि 'बादल ने चन्दा मामा को अपने घर में बंद कर लिया है. अब उसको आने नहीं देंगे'
कल शाम की बात आज सुबह याद आई और हमें एहसास हुआ कि हमें अभी भी बच्चों से बात करना नहीं आया. कि बच्चे की तरह मोहक तरीके से सोच पाना बड़ों केलिए आसान बात नहीं है. हमें यानुश कोर्चाक का वह वक्तव्य भी याद आया कि " अच्छी शिक्षा के लिए शिक्षक को बच्चों के स्तर तक ऊपर उठकर कल्पना करनी होगी".

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