राजनीति में जिसे कला कहते हैं उसे सकारात्मक अर्थ में लिया जाए या नहीं, यह एक विचारणीय विषय है क्योंकि राजनीति का अभिधात्मक अर्थ उसके चंचल और मैनिपुलेटिव अर्थ में ही समझा जाता है।
मेरे विचार में राजनीति और कला दोनों को ही सकारात्मक और उदात्त अर्थ में समझे जाने की आवश्यकता है। अर्थ-विस्थापन के समय में राजनीति जैसे आवश्यक कार्य-व्यापार को बुरे अर्थ में सीमित करने के परिणाम केवल बुरे ही हो सकते हैं।
वास्तव में शब्दों को उनकी वास्तविक गरिमा के माध्यम से समझना और उनके विभव (potentiality) को सम्मान देना सभ्यता के स्वास्थ्य के लिए अच्छा है. दुनिया को समझना भाषा के माध्यम से संभव होता है और भाषा की सम्भावनाओं को सीमित या दूषित करना समझ को दूषित/ सीमित करने के बराबर है और अंततः यह साभ्यतिक कारणों से शुभ नहीं होगा।
मेरे विचार में राजनीति और कला दोनों को ही सकारात्मक और उदात्त अर्थ में समझे जाने की आवश्यकता है। अर्थ-विस्थापन के समय में राजनीति जैसे आवश्यक कार्य-व्यापार को बुरे अर्थ में सीमित करने के परिणाम केवल बुरे ही हो सकते हैं।
वास्तव में शब्दों को उनकी वास्तविक गरिमा के माध्यम से समझना और उनके विभव (potentiality) को सम्मान देना सभ्यता के स्वास्थ्य के लिए अच्छा है. दुनिया को समझना भाषा के माध्यम से संभव होता है और भाषा की सम्भावनाओं को सीमित या दूषित करना समझ को दूषित/ सीमित करने के बराबर है और अंततः यह साभ्यतिक कारणों से शुभ नहीं होगा।
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